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एआई की नैतिक दुविधा: प्रगति या पैंडोरा का पिटारा?

एआई सुविधा और शक्ति का वादा करता है - लेकिन क्या हम नैतिक निर्णयों के लिए उस पर भरोसा कर सकते हैं?

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वैश्वीकृत दुनिया में सांस्कृतिक साक्षरता आज भी क्यों महत्वपूर्ण है

वैश्विक बनने की दौड़ में क्या हम अपनी सांस्कृतिक बुनियाद खो रहे हैं?

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क्या भारत की राजनीतिक बातचीत अत्यधिक ध्रुवीकृत होती जा रही है?

राजनीतिक बहसें पहले मुद्दों पर होती थीं — अब वे अक्सर पहचानों पर केंद्रित हो जाती हैं। हमने सूक्ष्मता कहाँ खो दी?

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भ्रामक जानकारी के युग में पत्रकारिता की भूमिका

दुष्प्रचार लोकतंत्र के लिए सबसे बड़े खतरों में से एक बनकर उभरा है। क्या इस दौर में पत्रकारिता अभी भी सत्य की सेवा कर सकती है?

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