कुशोक बकुला के विचार आज भी प्रासंगिक:दत्तात्रेय होसबोले

 


लद्दाख संभाग के लेह के सेंट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ बुद्धिस्ट स्टीडीज (CIBS) में 19वें कुशोक बकुला लोबजंग थुबतन छोगनोर रिम्पोछे जन्म शताब्दी समारोह सम्पन्न हो गया। समारोह में बतौर विशिष्ट अतिथि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह-सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबोले ने शिरकत की।

लेह में 16 से 18 मई तक चले इस 3 दिवसीय समापन समारोह का आयोजन जम्मू कश्मीर स्टडी सेंटर(JKSC) और इंडिया फाउंडेशन की तरफ से संयुक्त रूप से किया गया।

इस मौके पर 20वें कुशोक बकुला (12 वर्षीय नाशटन) ने भी समारोह में शिरकत की। इस मौके पर दत्तात्रेय होसबोले ने कहा कि 19वें कुशोक बकुला बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी थे इसलिए वो आज भी प्रसांगिक हैं और समाज के लिए रोल मॉडल हैं। वे आध्यात्मिक नेता, वक्ता, महान बुद्ध विचारक और दूरदर्शी कुशल राजनयिक थे। साथ ही दत्तात्रेय होसबोले ने कहा कि अगर आज की तारीख में लद्दाख भारत का अभिन्न हिस्सा है तो इसका श्रेय कुशोक बकुला को जाता है। 1947 में जब पाकिस्तान ने जम्मू-कश्मीर पर हमला किया तो उन्होंने लद्दाख के युवाओं को संगठित कर भारतीय सेना को पूर्ण रूप से सहयोग किया।

उन्होंने हमेशा लद्दाख को भारत के अभिन्न अंग के तौर पर देखा और इस क्षेत्र को विकसित करने के काफी प्रयास किए।

 

दत्तात्रेय ने कहा कि आज देश के अलग अलग हिस्सों में अलगाववाद की आवाज उठती है यहां कि विश्वविद्यालयों में भी राष्ट्र विरोधी एजेंडे चलाए जा रहे हैं। ऐसे समय में कुशोक बकुला के भाषण युवाओं को सही रास्ता दिखा सकते हैं। इस मौके पर दत्तात्रेय होसबोले ने कुशोक बकुला के मंगोलियां में किए गए शांति प्रयासों का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि कुशोक बकुला को मंगोलिया का राजदूत नियुक्त करना भारत सरकार का सराहनीय कदम था। जबकि वो प्रोफेशनली राजनयिक नहीं थे इसके बावजूद उन्होंने मंगोलियां में सांस्कृतिक-आध्यात्मिक और मानवता की पृष्ठिभूमि पर दो देशों के सम्बंधों को और प्रगाढ किया।

कुशोक बकुला के प्रयास से ही मंगोलिया में शांति वापस हुई और कम्युनिस्ट बुध्द के रास्ते पर आ सके।

कार्यक्रम में जम्मू कश्मीर के उपमुख्यमंत्री कवीन्द्रर गुप्ता ने बतौर मुख्य अतिथि शिरकत की, वहीं अध्यक्षता आईसीपीआर के चेयरमैन प्रोफेसर एस आर भट्ट ने की। साथ ही कार्यक्रम में मंगोलिया के भारतीय राजदूत जी.गनबोल्ड, लद्दाख अफेयर्स मंत्री छेरिंग दोरजे, नेहरू मेमोरियल लाईब्रेरी के निदेशक शक्ति सिन्हा, आईसीपीआर के सदस्य सचिव प्रो. रजनीश शुक्ला, जेकेएससी ट्रस्टी अनिल गोयल, इंडिया फाउंडेशन के निदेशक आलोक बंसल, आईजीएनसीए से डॉ. मयंक शेखर ने कुशोक बकुला पर अपने विचार रखे।

इस मौके पर डिप्टी सीएम कवींदर गुप्ता ने 19वें कुशोक बकुला पर कार्यक्रम करने के लिए संस्थाओं को बधाई देते हुए कहा कि महान बौद्ध धर्म गुरू के विचार आज भी समाज को एक नई दिशा देते हैं। डिप्टी सीएम ने कहा कि

सीजफायर हुआ है कि वो एक शांति प्रयास है इसका मतबल ये है नहीं है कि हम आक्रमण का जवाब नहीं देंगे। भारतीय सुरक्षाबल पूर्ण रूप से सक्षम हैं और देश की सुरक्षा के लिए उन्हें जो भी कार्रवाई करनी होगी वो करेंगे।

कार्यक्रम में प्रोफेसर कुलदीप अग्निहोत्री की किताब ‘जम्मू कश्मीर का विस्मृत अध्याय:कुशोक बकुला’  का विमोचन किया गया।

19वें कुशोक बकुला जन्म शताब्दी समापन समारोह के पहले दिन 16 मई को जम्मू कश्मीर विधानसभा के डिप्टी स्पीकर डॉ. निर्मल सिंह ने शिरकत की और इस मौके पर ‘बहुजन हिताय-बहुजन सुखाय लोकानुकम्पाय’ और ‘जियो स्ट्रेटजी ऑफ हिमालयन रीजन’ पर चर्चा आयोजित की गई। कार्यक्रम में जेकेएससी के निदेशक आशुतोष भटनागर ने कहा कि कुशोक बकुला ने जो देश के लिए योगदान दिया है उन महान कार्यों से लोगों को परिचत होना चाहिए। जेकेएससी जम्मू कश्मीर के सभी हिस्सों की समृद्ध और गौरवशाली संस्कृति से लोगों को रूबरू करवा रहा है।

कुशोक बकुला : संक्षिप्त परिचय
19वें कुशोक बकुला का जन्म 21 मई 1917 को हुआ था। अब उनके जन्म के सौ बरस पूरे हो गए हैं। उन्होंने 4 नवंबर 2003 को देह त्यागी थी। वे लद्दाख के सर्वाधिक लोकप्रिय-प्रसिद्ध लामाओं में से एक थे। वे भारत के अंतरराष्ट्रीय राजनयिक भी थे। उन्होंने मंगोलिया और रूस में बौद्ध धर्म के पुनरुत्थान के लिए उल्लेखनीय योगदान दिया। सुदूर मंगोलिया और बेलारूस तक में उनका स्मरण किया जा रहा है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक श्री मोहन भागवत जी ने 30 सितंबर को विजयदशमी के अपने संबोधन में कुशोक बकुला का भावभीनी स्मरण किया। 19वीं कुशोक बकुला श्री लोबजंग थुबतन छोगनोर का राष्ट्रीय नव निर्माण में अहम भूमिका रही है। जम्मू कश्मीर में भारत विरोधी शक्तियों के षडयंत्रों को असफल करने में महाराजा हरि सिंह और पंडित प्रेमनाथ डोगरा के अलावा 19वें कुशोग बकुला का योगदान ही सर्वाधिक है। उन्होंने एक सच्चे महास्थविर की तरह स्वयं को जन कल्याण के लिए समर्पित कर दिया था। सच्चा महास्थविर निर्वाण प्राप्ति के लिए योग्य होता हुआ भी बार-बार इस संसार में जन्म ग्रहण करता है ताकि सामान्य जन के दुखों का निराकरण कर सके। बकुला ने 20वीं शताब्दी में यही कर दिखाया। उनके लिए साधना और तपस्या साधारण जन का दुख निवारण ही थी। बकुला का मूल नाम क्या था, इसके बारे में पता पाना तो कठिन हैं।

बौद्ध जगत में बकुला के नाम से ही प्रसिद्ध हैं। उनके नाम को लेकर एक कथा प्रचलित है। कहा जाता है कि बकुला प्रार्थना और ध्यान साधना में मग्न रहते थे। उन्होंने सभी सांसारिक सम्पत्तियों और एषनाओं का त्याग कर दिया था। वे सोने और बिछाने के लिए अब केवल पकुला घास का ही प्रयोग करते थे। पकुला का प्रयोग करने के कारण वे धीरे-धीरे सामान्य जन में बकुल या बकुला के नाम से जाने जाने लगे।

लोकसभा में कुशोक बकुला
1967 में वे चौथी लोकसभा के लिए लेह क्षेत्र से चुन लिए गए। 1971 में वे एक बार फिर इसी क्षेत्र में 5वीं लोकसभा के लिए चुने गए। इस प्रकार वे 1977 तक 10 साल लोकसभा के सदस्य रहे।

जम्मू-कश्मीर विधानसभा में कुशोक बकुला
लद्दाख के लोगों ने संविधान सभा में जाने के लिए कुशोग बकुला से आग्रह किया। वे राज्य की इस संविधान सभा में लेह से निर्विरोध चुने गए। संविधान सभा के चुनावों तक तो शेख मोहम्मद अब्दुल्ला भारत की कसमें खाते थे लेकिन संविधान सभा में नेशनल कॉन्फ्रेंस के सदस्य भर देने के बाद उनका रवैया बदला। शेख अब्दुल्ला जम्मू कश्मीर की स्वायत्तता के नाम पर व्यवहारिक रूप में स्वतंत्र राज्य का सपना देखने लगे। ऐसे अवसर पर कशुक बकुला ने व्यापक राष्ट्रहित में मोर्चा संभाला। नव निर्वाचित संविधान सभा का पहला सत्र 31 अक्टूबर 1951 को शुरू हुआ। दूसरे दिन प्रथम नवंबर को बोलते हुए कुशोग बकुला ने आशा व्यक्त की यह सदन उन समस्याओं का समाधान खोजेगा जिनको आज तक हल नहीं किया जा सका।

अल्पसंख्यक आयोग के सदस्य
1978 में भारत सरकार ने राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग का गठन किया। अगस्त 1978 में कुशोग बकुला को आयोग का सदस्य नियुक्त किया गया और वे दिसंबर 1989 तक इस आयोग के सदस्य रहे।

पद्म भूषण सम्मान
भारत सरकार ने कशुक बकुला को 1988 में राष्ट्रपति ने पद्म भूषण से सम्मानित किया।