जम्मू में आचार्य अभिनव गुप्त सहस्राब्दी समारोह का विधिवत शुभारम्भ


फोटो- पद्मश्री जवाहर लाल कौल द्वारा हिन्दी में लिखी गई पुस्तक 'अभिनवगुप्त और शैव दर्शन का पुनरोदय' व प्रदीप कौल द्वारा अंग्रेजी भाषा में लिखित पुस्तक अभिनवगुप्ता द लाइट आफ इंडियाका भी विमोचन करते आचार्य शिव प्रसाद रैना, जीडी शर्मा (पूर्व न्यायाधीश),डॉ निर्मल सिंह (उप मुख्यमंत्री, जम्मू-काश्मीर), प्रो. विश्वमूर्ति शास्त्री और राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान के प्रमुख प्रो. रामानुजन देवनाथन।

आचार्य अभिनवगुप्त के विचारों को अपनाएं युवा- डॉ. निर्मल सिंह

आचार्य अभिनवगुप्त की पुस्तक का हुआ विमोचन

जम्मू, 26 अप्रैल। जम्मू काश्मीर संत- महात्माओं की धरती रही है। यहां जन्में महापुरुषों के ज्ञान प्रकाश से पूरा देश अवलोकित हुआ है। इसी परंपरा में आचार्य अभिनवगुप्त का भी नाम आता है, जिनका शैव दर्शन आज पूरे विश्व में शोध का विषय बना हुआ है। उक्त बातें जम्मू क्लब में आचार्य अभिनवगुप्त सहस्राब्दी समारोह द्वारा आयोजित उद्घाटन समारोह में उप मुख्यमन्त्री डा. निर्मल सिंह ने कही। डॉ. निर्मल सिंह ने कहा कि हमारा सौभग्य है कि हम इस पावन भूमि में पैदा हुए, लेकिन दुर्भाग्य ये है कि हम आज अपने आचार्यो, परंपराओं और संस्कृत को भूलते जा रहे हैं। अगर समय रहते इसका संरक्षण नहीं हुआ तो यह धीरे-धीरे नष्ट होती जाएगी। आज के युवाओं को चाहिए कि वह इन विद्वानों की सोच, ज्ञान-दर्शन को अपनाते हुए इसे प्रचारित करने में आगे आयें। उन्होंने कहा कि समाज जिस संक्रमण काल से गुजर रहा है उससे निपटने के लिए आचार्य अभिनवगुप्त के विचार और दर्शन सबसे उपयोगी है। 

आचार्य शिव प्रसाद रैना ने अपने स्वागत भाषण में कहा कि जम्मू काश्मीर की ज्ञान परंपरा ने जो पूरे देश को संदेश दिया है उसे चाहते हुये भी अनदेखा नहीं किया जा सकता। यह मानव कल्याण से युक्त है। अभिनवगुप्त एक विलक्षण प्रतिभा के धनी थे, वे भले ही शैव को मानते थे लेकिन उन्होंने कभी भी किसी अन्य मतावलंबियों की आलोचना नहीं की। अपने स्वागत भाषण में आचार्य रैना ने आचार्य अभिनवगुप्त सहस्राब्दी समारोह समिति द्वारा पूरे वर्ष भर के कार्यक्रमों की रूपरेखा भी रखी।

कार्यक्रम में मुख्य वक्ता प्रो. मोती लाल पंडिता ने कहा कि आचार्य अभिनवगुप्त गुरु परंपरा के सबसे बड़े वाहक रहे हैं और उनके गुरुओं की एक लंबी श्रृंखला पायी जाती है। उन्होंने अपने अध्ययन काल में अलग-अलग विषयों पर विभिन्न गुरुओं से शिक्षा ग्रहण की है। उनके ज्ञान की विशालता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि एक तरफ उन्होंने तन्त्र पर लिखा तो दूसरी तरफ नाट्यशास्त पर टीका भी लिखी। संस्कृत विद्यापीठ के आचार्य विश्वमूर्ति शास्त्री ने  कहा कि आचार्य अभिनवगुप्त ने हमें आलंकारिक तंत्र , राष्ट्रवाद, शैव दर्शन तथा काव्य दिये। भारतीय अलंकार शास्त्र से अगर आचार्य अभिनवगुप्त के द्वारा लिखे गए अलंकार निकाल लिए जाए तो शेष कुछ नहीं बचता। उन्होंने कहा कि अलंकार शास्त्र  कुमकुम केसर के रस पर टिका है और यह शब्द अभिनवगुप्त ने खोजा कि रस की अभिव्यक्त की जा सकती है।

कार्यक्रम का शुभारंभ महामण्डलेश्वर महंत रामेश्वर दास जी, स्वामी दया नन्द जी तथा अन्य  संतजनों को पुष्पमाला पहनाकर की गई, इसके पश्चात वैदिक मन्त्रोच्चार और शंखनाद के बीच दीप प्रज्वलन हुया। इस अवसर पर आचार्य अभिनवगुप्त द्वारा लिखित भैरो स्तुति प्रस्तुत की गई।

कार्यक्रम में समारोह समिति द्वारा जम्मू काश्मीर के उप मुख्यमन्त्री डॉ. निर्मल सिंह से आचार्य अभिनवगुप्त के नाम पर राज्य में किसी स्थान का नाम रखने का अनुरोध किया गया जिसपर निर्मल सिंह ने अपनी सहमति जताते हुए प्रस्ताव की मांग की। कार्यक्रम में जम्मू-काश्मीर अध्ययन केन्द्र, संस्कार भारती, संस्कृत भारती, ईश्वर आश्रम, संजीवनी शारदा केन्द्र, आर्ट ऑफ लिविंग सहित विभिन्न संस्थाओं के प्रतिनिधि उपस्थित थे।