तथ्यों और तर्कों से निकलेगा कश्मीर समस्या का समाधान- आशुतोष

जेकेएससी और इतिहास विभाग के संयुक्त तत्वाधान में चल रही है कार्यशाला

Ashutosh Bhatnagar, Director, JKSC, N. Delhi

 मेरठ, 14 मार्च। हिमालय और हिन्द महासागर हमारा परिचय भी है और पहचान भी है, जब तक हिमालय के शिखर और हिन्द महासागर की लहरें हमारे नियंत्रण में रहीं हम विश्व विजेता बने रहें और भारत सोने की चिड़िया कहलाए। लेकिन जैसे ही यह हमारे नियंत्रण से बाहर निकला भारत आर्थिक और सामरिक दोनों स्थिति में कमजोर देशों की श्रृंखला में शामिल हो गया। उक्त बातें जम्मू-काश्मीर अध्ययन केन्द्र के निदेशक आशुतोष भटनागर ने कही। जम्मू काश्मीर अध्ययन केन्द्र और चौ. चरण सिंह विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग के संयुक्त तत्वाधान में आयोजित ‘जम्मू काश्मीर- एक नवविमर्श’ विषयक दस दिवसीय कार्यशाला में बोलते हुए आशुतोष भटनागर ने जम्मू, कश्मीर और लद्दाख के भौगोलिक, सामाजिक और रणनीतिक महत्व पर प्रकाश डाला।

जेकेएससी निदेशक आशुतोष भटनागर ने कहा कि जम्मू काश्मीर का प्रश्न भारत के लिए अत्यन्त महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह क्षेत्र अनादि काल से भारतीय संस्कृति का परिचायक रहा है और सिन्धु सभ्यता ने भी यहीं से जन्म लिया। आज आतंक की बात तो होती है लेकिन इस क्षेत्र के कला, साहित्य, दर्शन और धार्मिकता को लेकर चर्चा भी नहीं होती। उन्होंने कहा कि सात दशक बीतने के बाद भी आज समस्या वैसी की वैसी बनी हुई है, लेकिन इस समस्या के समाधान के लिए अब अकादमिक स्तर पर पहल शुरु हो चुकी है। क्योंकि अब यह तय हो गया है कि जम्मू काश्मीर का यह मसला नारों और कहानियों से नहीं बल्कि तथ्यों और शोधपरक विश्लेषणों पर ही संभव है।

कार्यशाला में मुख्य वक्ता आशुतोष भटनागर ने कहा कि यह विडंबना ही है कि जिस भूमि से भारत की सांस्कृतिक यात्रा प्रारंभ हुई, जहां उसके शाश्वत मूल्यों की खोज हुई, जहां हिन्दू जीवन शैली का आविर्भाव हुआ, भारत के नागरिक आज उसके दर्शन से भी वंचित हैं। उससे भी बड़ा दुर्भाग्य तो यह है कि इतना सब होने के बावजूद पिछले कई दशकों से यहां की सरकारों ने भी इस मसले को हल करने के लिए कोई सार्थक कदम नहीं उठाया। इसके अलावां अपने अदूरदर्शी निर्णयों को ढकने के लिए तत्कालिक सरकारों ने इस विषय को प्रारंभ से ही उलझाए रखा। उन्होंने कहा कि जिस तरह जम्मू काश्मीर के मसले पर तथ्यों और शोध के माध्यम से नया विमर्श शुरू हुआ है उससे वहां की परिस्थितियां काफी बदल रही हैं और कश्मीर को लेकर जनता के बीच बना भ्रम भी धीरे-धीरे टूट रहा है।

कार्यशाला के दोनों सत्रों की अध्यक्षता एस. डी. कॉलेज की प्राचार्या डॉ. मंजू ने किया और प्रो. आराधना ने पुष्प गुच्छ और स्मृति चिन्ह देकर अतिथियों का स्वागत किया और आगामी कार्यक्रम की को बताते हुए कहा कि कल इस कार्यशाला में चले विषयों पर परिचर्चा होगी उसके बाद एक परीक्षा का आयोजन किया जाएगा।