‘जम्मू काश्मीर- एक नवविमर्श’ विषयक दस दिवसीय कार्यशाला का चौथा दिन

Dilip K. Dubey, Director. D.K. Dubey's Law Academy

 मेरठ, 11 मार्च। जम्मू काश्मीर अध्ययन केन्द्र और चौ. चरण सिंह विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग के संयुक्त तत्वाधान में आयोजित ‘जम्मू काश्मीर- एक नवविमर्श’ विषयक दस दिवसीय कार्यशाला के चौथे दिन जम्मू काश्मीर के संवैधानिक पक्ष और मानवाधिकारों को लेकर चर्चा हुई। कार्यशाला के प्रथम सत्र में बतौर मुख्य वक्ता शिरकत करने पहुंचे सर्वोच्च न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता दिलीप दुबे ने कहा कि भारत के संविधान ने हर नागरिक को मौलिक अधिकार दिये हैं जो कि इसकी प्रस्तावना में निहित है, जिसे संसद भी नहीं बदल सकती, लेकिन देश के अभिन्न राज्य जम्मू-कश्मीर में कुछ ऐसे प्रावधान लागू किये गये जो भारतीय संविधान की भावना से मेल नहीं खाते। इसके कारण यहां के कुछ वर्ग उन प्रावधानों से वंचित हैं जिनका लाभ देश के अन्य नागरिक उठा रहे हैं।

अनुच्छेद 35 ए के संवैधानिक पक्ष पर चर्चा करते हुए सर्वोच्च न्यायालय के अधिवक्ता दिलीप दुबे ने कहा कि यह अनुच्छेद एक संवैधानिक संशोधन था। इसे 1954 में राष्ट्रपति की स्वीकृति मिली, लेकिन इसकी जानकारी संसद को नहीं दी गयी थी, जिसे संविधान में संशोधन करने का अधिकार है। यह भारतीय संविधान के साथ एक धोखा है। जिसका भुगतान जम्मू-कश्मीर के पीड़ित आज तक कर रहे हैं।

दूसरे सत्र को संबोधित करते हुए अधिवक्ता संजय त्यागी ने कहा, ‘संवैधानिक विसंगतियां यहां इस कदर प्रभावी हैं कि अनुच्छेद 35 ए के कारण राज्य में रह रहे पश्चिमी पाकिस्तान से आए शरणार्थी, बाल्मीकी, गोरखा सहित लाखों लोगों अपने मूलभूत अधिकारों से वंचित हैं। छह दशक से अधिक समय बीत जाने के बाद भी ये न तो सरकारी नौकरी के लिए आवेदन कर सकते हैं और न ही इनके बच्चे यहां व्यावसायिक शिक्षा में दाखिला ले सकते हैं।’ अधिवक्त संजय त्यागी के अनुसार जम्मू-कश्मीर का गैर स्थायी निवासी (नॉन पीआरसी) लोकसभा में तो वोट दे सकता है, लेकिन स्थानीय निकाय चुनाव में वोट नहीं दे सकता। राज्य का गैर स्थायी नागरिक प्रधानमंत्री तक बन सकता है, लेकिन ग्राम पंचायत का सरपंच नहीं बन सकता। इतना ही नहीं इस प्रावधान में वह आईएएस और आईपीएस अधिकारी तो बन सकता है, लेकिन राज्य के सरकारी महकमें में चपरासी नहीं बन सकता।

खुले सत्र में चर्चा के दौरान जेकेएससी से जुड़े रंजन चौहान ने कहा कि जम्मू-कश्मीर किसी भी अन्य राज्य की तरह भारतीय संघ का अभिन्न अंग है। वहां का प्रत्येक निवासी भारतीय नागरिक है और उसे वे सभी अधिकार हासिल हैं जो भारत के किसी भी नागरिक को हैं। संविधान का कोई भी प्रावधान उसे मौलिक अधिकार प्राप्त करने से रोक नहीं सकता। लेकिन कुछ संवैधानिक विसंगतियों की वजह से राज्य में पश्चिमी पाकिस्तान से आये शरणार्थी, बाल्मीकी, गोरखा सहित महिलाओं को उनके मौलिक अधिकार नहीं मिल रहें हैं। जिसका संवैधानिक हल खोजा जाना समय की मांग है।

जेकेएससी से जुड़े रंजन चौहान ने कहा कि जम्मू-काश्मीर को लेकर बहुत से लोग पूछते हैं कि वहां की वास्तविक समस्या क्या है। क्या वहां आतंकवाद है, क्या वहां अलगाववाद है। इस विषय में मैं सब लोगों से कहता हूं कि यह सब बातें ठीक हैं लेकिन यहां का वास्तविक प्रश्न कुछ और ही है, जम्मू-काश्मीर को लेकर लोगों में जानकारी का अभाव ही सबसे बड़ी समस्या है। उन्होंने कहा कि जम्मू-कश्मीर के मसले पर बहस कानूनी और संवैधानिक दस्तावेजों के आधार पर होनी चाहिए।

कार्यशाला में इतिहास विभाग की अध्यक्षा प्रो. आराधना ने मुख्य वक्ता दिलीप दुबे, संजय त्यागी और रंजन चौहान का पुष्प गुच्छ और स्मृति चिन्ह देकर स्वागत किया। सत्र का संचालन डॉ. राजनरायन शुक्ल ने किया। कार्यशाला में मुख्य रूप से प्रो. विकास शर्मा, डॉ. महिमा मिश्रा, डॉ. हेमन्त पाण्डेय, डॉ. अजय विजय कौर, डॉ. नवीन गुप्ता, डॉ. अर्पणा, डॉ. आरती सहित कई प्राध्यापक और शोध छात्र-छात्राएं उपस्थित रहे। कार्यशाला में डॉ. शुचि गुप्ता, डॉ. विशाल तिवारी, डॉ. किरण कुमार, डॉ. अमित कुमार, मोहित, पवन और जयदीप का विशेष सहयोग रहा।

कार्यशाला के पांचवे दिन जम्मू काश्मीर की ऐतिहासिक संदर्भ से लेकर राजनैतिक झंझावातों पर चर्चा करने के लिए हिमाचल प्रदेश केन्द्रिय विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. कुलदीप चन्द अग्निहोत्री शिरकत कर रहे हैं। इसके साथ ही ‘जम्मू काश्मीर- लोकतात्रिक प्रक्रिया और जनसहभाग’ पर जम्मू काश्मीर अध्ययन केन्द्र के निदेशक आशुतोष भटनागर बतौर मुख्य वक्ता सत्र को संबोधित करेंगे।