जम्मू-काश्मीर अध्ययन केंद्र ने 70वें विलय दिवस पर संगोष्ठी का किया आयोजन


 

नई दिल्ली, 26 अक्तूबर 2016। महाराजा हरि सिंह ने जम्मू-काश्मीर को जो गौरव दिलाया था, पिछले साठ वर्षों में हमने उसे खो दिया है। लेकिन आज समय और परिस्थितियां बदली हैं और लोगों में एक उम्मीद की किरण जगी है। उक्त बातें जम्मू कश्मीर अध्ययन केंद्र और इंडिया फ़ाउंडेशन के संयुक्त तत्वाधान में आयोजित एक परिसंवाद में बतौर मुख्य वक्ता केंद्रीय राज्य मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा।

‘नेहरू स्मारक संग्रहालय व लाइब्ररी’ के ऑडिटोरिय में जम्मू-काश्मीर के 70वें विलय दिवस पर आयोजित परिसंवाद में बोलते हुए डॉ. जितेन्द्र सिंह ने कहा कि आज जम्मू-काश्मीर के विलय को लेकर लोगों में भ्रम की स्थिति पैदा की गयी है। तथाकथित बुद्धजीवी वर्ग भी इसपर सवाल उठाते हैं कि जम्मू काश्मीर पाकिस्तान के साथ जाना चाहता था या स्वतंत्र रियासत के रुप में रहना चाहता था, लेकिन इसके पीछे की सच्चाई कुछ और ही है। जम्मू काश्मीर से जुड़े तथ्यों को जान बूझकर दबाया जा रहा है ताकि यह विषय विवादित बना रहे।

डॉ. जितेन्द्र सिंह ने जम्मू काश्मीर के विलय, महराजा हरि सिंह की दूरदर्शिता और वर्तमान में जम्मू-काश्मीर की स्थिति पर बेबाकी से अपनी राय रखी। महाराजा हरी सिंह के विषय में बोलते हुए उन्होंने कहा कि इतिहास ने एक महान भारतवादी और प्रजा भक्त राजा के साथ अन्याय किया है। महाराजा ने अपने समय में विज्ञान, स्वास्थ्य, सुशासन को सुदृढ़ बनाने के लिए संस्थाओं की स्थापना की थी। उन्होंने कहा कि जब प्रत्येक प्रदेश अपना स्थापना दिवस मानता है तो जम्मू काश्मीर दिवस मानने में संकोच कैसा।


 

कार्यकर्म का शुरुआत करते हुए जम्मू काश्मीर केंद्र के अध्यक्ष पद्मश्री जवाहरलाल कौल ने अनुछेद 370 से उत्पन्न होने वाले विसंगतियों की चर्चा की। वहीं परिसंवाद में एक अन्य वक्ता मरूफ रजा ने पाकिस्तान के नापाक इरादों की बात कही। रजा ने 1948 में सेना के हमले और उससे जुड़े हुए तथ्यों को बारीकी से रखा। कार्यक्रम का संचालन इंडिया फ़ाउंडेशन के श्री आलोक बंसल ने किया और जम्मू काश्मीर अध्ययन केंद्र के सचिव आशुतोष भटनागर ने सभी का आभार व्यक्त किया।   

अवनीश राजपूत (जम्मू काश्मीर अध्ययन केन्द्र)