सरसंघचालक को आचार्य अभिनवगुप्त पर लघु पुस्तक भेंट की

जम्मू कश्मीर अधययन केंद्र के राष्ट्रीय निदेशक, आशुतोष भटनागर और मुंबई अध्ययन केंद्र की शक्ति मुंशी सरसंघचालक को साहित्य भेंट करते हुए.

 इस साल 4 जनवरी 1016 को काश्मीर के महान दार्शनिक आचार्य अभिनवगुप्त को शिवत्व की प्राप्ति हुई थी. शिवत्व प्राप्ति के एक हज़ार वर्ष पूर्ण होने के उपलक्ष्य में, पूरे साल, आचार्य अभिनवगुप्त सहत्राब्दि समारोह मनाया जायेगा। हिंदी की तिथि के अनुसार यह अभिनवगुप्त सहस्राब्दी वर्ष 4 जनवरी 2016 से शुरू होकर 7 जनवरी 2017 तक चलेगा।

जम्मू कश्मीर अध्ययन केंद्र ने, अभिनवगुप्त सहस्राब्दी शुरू होने के उपलक्ष्य पर, राष्ट्रिय स्वयं सेवक संघ के सरसंघचालक मोहनराव भागवत को अभिनवगुप्त से जुड़ा साहित्य भेंट किया। जम्मू कश्मीर अधययन केंद्र के राष्ट्रिय निदेशक, आशुतोष भटनागर और मुंबई अध्ययन केंद्र की शक्ति मुंशी, 4 जनवरी को पू. सरसंघचालक जी से नागपुर में मिले मिलने गए थे।

कुछ ही दिन पहले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह, मा. सुरेश भैया जी जोशी, ने भी देश भर में अभिनवगुप्त की जीवनी और कृतियों से आज के युवाओं को अवगत कराने का आव्हान किया था. “काश्मीर की प्राचीन आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक विरासत को समय की चुनौतियों के साथ समन्वयकारी नए रूप में व्याख्यायित करने वाले इस महापुरूष के जीवन तथा उनकी कृतियों से, वैचारिक कट्टरता के इस युग में समस्त विश्व को, विशेषकर युवाओं को अवगत कराना, उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।” कुछ दिन पहले अपने वक्तव्य में भैया जी जोशी ने आव्हान किया था।

 

विदित रहे कि जम्मू कश्मीर अध्ययन केंद्र के साथ देश भर की सिविल सोसाइटी ने वर्ष भर काश्मीर के अभिनवगुप्त की सहस्राब्दी मनाने का संकल्प लिया है। इसी कड़ी में आर्ट्स ऑफ़ लिविग के संस्थापक और अध्यात्मिक शिक्षक, श्री श्री रविशंकर ने युट्यूब पर जारी किये अपने विडियो में लोगों विशेषकर युवाओं से आग्रह किया कि, “तनाव से ग्रस्त हमारे संसार में काश्मीर के जो आध्यात्मिक फूल हैं उनकी सुगंध की बहुत आवश्यकता है। मैं युवाओं से अनुरोध करुंगा, विशेषकर काश्मीर के हर एक युवा से.... चाहे वो किसी भी धर्म, पंथ के अनुयायी हों.. अभिनवगुप्त का सम्मान करें और उनकी कृतियों को पढ़ें।”

अभिनवगुप्त ने काश्मीर की प्राचीन आध्यात्मिक और सांस्कृतिक विरासत को नए और समन्वयकारी रूप में प्रस्तुत किया। दुनिया के जाने माने विश्वविद्यालयों में उनके ग्रंथों पर व्यापक शोध जारी हैं और अंग्रेजी के अलावा फ्रेंच, जर्मन और स्पेनिश भाषा में उनके बारे में कई ग्रन्थ लिखे गए हैं।अभिनवगुप्त तंत्रशास्त्र, साहित्य और दर्शन के प्रौढ़ आचार्य थे और इन तीनों विषयों पर इन्होंने 50 से ऊपर मौलिक ग्रंथों, टीकाओं तथा स्तोत्रों का निर्माण किया है। अभिरुचि के आधार पर इनका सुदीर्घ जीवन तीन कालविभागों में विभक्त किया जा सकता है। जीवन के आरंभ में अभिनवगुप्त ने तंत्रशास्त्रों का गहन अनुशीलन किया तथा उपलब्ध प्राचीन तंत्रग्रंथों पर इन्होंने अद्धैतपरक व्याख्याएँ लिखकर लोगों में व्याप्त भ्रांत सिद्धांतों का सफल निराकरण किया। क्रम, त्रिक तथा कुल तंत्रों का अभिनव ने क्रमश: अध्ययन कर तद्विषयक ग्रंथों का निर्माण इसी क्रम से संपन्न किया।

 

इस युग की प्रधान रचनाएँ बोधपंचदशिका, मालिनीविजय कार्तिक, परात्रिंशिकाविवरण, तन्त्रालोक, तन्त्रसार, तंत्रोच्चय, तंत्रोवटधानिका हैं। आलंकारिक काल युग से संबद्ध तीन प्रौढ़ रचनाओं काव्य-कौतुक-विवरण, ध्वन्यालोकलोचन तथा अभिनवभारती का परिचय प्राप्त है। अभिनवभारती, भरत मुनि के नाट्यशास्त्र के पूर्ण ग्रंथ की पांडित्यपूर्ण प्रमेयबहुल व्याख्या है। यह नाट्यशास्त्र की एकमात्र टीका है। दार्शनिक काल अभिनवगुप्त के जीवन में पांडित्य की प्रौढ़ि और उत्कर्ष का युग है। इस काल की प्रौढ़ रचनाओं में भगवद्गीतार्थसंग्रह, परमार्थसार, ईश्वर-प्रत्यभिज्ञा-विमर्शिणी तथा ईश्वर-प्रत्यभिज्ञा-विवृति-विमर्शिणी प्रसिद्ध हैं।