(पाकिस्तानी उर्दू मीडिया) 'तीन पीढ़ियों की कुर्बानी, गुलाम कैसे रहेंगे कश्मीरी?'

अशोक कुमार

भारत प्रशासित जम्मू-कश्मीर में एक बार फिर पैदा हुए तनावपूर्ण हालात पाकिस्तानी उर्दू मीडिया की सुर्ख‌ियों में हैं। घाटी में तनाव पर जंग ने अपने संपादकीय का शीर्षक दिया है, 'कश्मीर बनेगा पाकिस्तान।'

अखबार लिखता है कि पूरी दुनिया मानती है कि जम्मू-कश्मीर विवादित इलाका है, जिसका फैसला संयुक्त राष्ट्र के प्रस्तावों के मुताबिक़ होना है। भारत भी इस सच्चाई को जानता है, लेकिन उसे पता है कि अगर कश्मीर में स्वतंत्र जनमत संग्रह हुआ तो नतीजा कभी भारत के हक में नहीं आएगा।

अखबार की राय है कि श्रीनगर में पाकिस्तान ज़िंदाबादऔर कश्मीर बनेगा पाकिस्तानके नारे लगना और पाकिस्तानी झंडा लहराया जाना इस बात का सबूत है।वहीं 'रोजनामा एक्सप्रेस' लिखता है कि कश्मीर घाटी में हिंदुओं को बसाकर, लाखों सैनिकों को तैनात कर और तथाकथित चुनावों के ज़रिए कठपुतली सरकार बनवाने से कश्मीर भारत का अटूट अंग नहीं बन जाता है।

अखबार लिखता है कि कश्मीरियों ने अपनी तीन पीढ़ियां आजादी के लिए कुर्बान की हैं, वो भला कैसे भारत के गुलाम रह सकते हैं, इसलिए दुनिया जल्द वो दिन देखेगी जब कश्मीर में आज़ादी का सूरज निकलेगा।

'नवा-ए-वक्त' लिखता है कि श्रीनगर में पाकिस्तानी परचम लहराया जाना और पाकिस्तान के हक़ में नारे लगना इस बात का सबूत है कि कश्मीरी लोगों का दिल पाकिस्तान के साथ धड़कता है और वो भारत के कब्ज़े को खारिज करते हैं।

अखबार लिखता है कि इस मुद्दे को न तो मसर्रत आलम पर गद्दारी का मुकदमा बनाकर दबाया जा सकता है और न ही अंधाधुंध गिरफ्तारियां करके। ऐसे में अगर भारत इस क्षेत्र में वाकई शांति चाहता है तो कश्मीरियों को आत्म निर्णय का हक देना होगा।

ऐसी ही राय जाहिर करते हुए 'रोज़नामा पाकिस्तान' कहता है कि भारत जबरदस्ती कश्मीर को अपनी जागीर बना कर नहीं रख सकता और आख‌िरकार इसका फैसला करने का हक उसे कश्मीर में रहने वालों को ही देना होगा।वहीं 'रोज़नामा दुनिया' ने पाकिस्तानी सेना प्रमुख जनरल राहील शरीफ की विदेशी एजेंसियों को दी गई इस चेतावनी पर संपादकीय लिखा है कि वे बलूचिस्तान में चरमपंथियों की मदद कर पाकिस्तान को अस्थिर करने से बाज आएं।

अखबार ने जहां भारत पर बलूचिस्तान में अशांति फैलाने के इल्जामों का जिक्र किया है, वहीं पाकिस्तान सरकार को भी हिदायत दी है कि बलूचिस्तान की समस्या ताकत के बल पर हल नहीं होगी, इसके लिए राजनयिक स्तर पर काम करना होगा।

वहीं 'जसारत' ने सिंध प्रांत में दसवीं की परीक्षाओं में धड़ल्ले से नकल की घटनाओं पर संपादकीय लिखा है। अखबार लिखता है कि कई परीक्षा केंद्रों पर नकल करने से रोकने पर शांति व्यवस्था ख़तरे में पड़ रही है तो कहीं-कहीं परीक्षा केंद्र का प्रबंधन करने वाले ही नकल करा रहे हैं और पांच सौ से पांच हज़ार में प्रश्न पत्र हल कराए जा रहे हैं।छुट्टी के बाद वापस आए राहुल गांधी किसान नेताओं से मिलते हुए। रुख भारत का करें तो 'हिंदोस्तान एक्सप्रेस' का संपादकीय है, 'लौट के राहुल घर को आए।'

अखबार लिखता है कि देखना ये है कि 57 दिन की छुट्टियों में आत्मचिंतन और सोच-विचार के बाद राहुल गांधी बेहाल कांग्रेस के जिस्म में कौन सा नया खून डालेंगे।

वहीं कश्मीर के हालात पर 'हमारा समाज' की टिप्पणी है कि सबसे पहले केंद्र सरकार को घाटी के बेरोज़गार युवाओं की समस्याओं को दूर करना चाहिए।

अखबार लिखता है कि वहां सुरक्षा बलों की कार्रवाई की भी निगरानी होनी चाहिए और अगर जहां भी सुरक्षा बलों का कसूर दिखे, सख्त कार्रवाई होनी चाहिए।


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