भीम राव आम्बेडकर और जम्मू कश्मीर का प्रश्न


भीम राव आम्बेडकर के जम्मू कश्मीर को लेकर क्या विचार थे , इसको लेकर आज फिर से चर्चा आरम्भ हो गई है । इसका कारण शायद यह हो कि जम्मू कश्मीर आज फिर देश की राजनीति के केन्द्र बिन्दु में आ गया है । नेहरु , डा० श्यामाप्रसाद मुखर्जी ,सरदार पटेल , डा० राजेन्द्र प्रसाद, के इस विषय पर विचार महत्वपूर्ण हैं । इसके साथ महाराजा हरि सिंह और शेख़ अब्दुल्ला के विचार भी महत्वपूर्ण हैं । जिन्ना के भी इस विषय पर निश्चित विचार थे । जब भी जम्मू कश्मीर की चर्चा होती है तो मुख्य तौर पर इन लोगों के इर्द गिर्द ही सारा मामला निकलता है और उसी से समाधान के रास्ते भी खोजे जाते हैं । इस सब के बीच भीम राव आम्बेडकर के जम्मू कश्मीर को लेकर विचार महत्वपूर्ण हो रहे हैं । इसके कारण जानना जरुरी है । लेकिन सबसे पहले विवाद की पृष्ठभूमि ।

दरअसल जम्मू कश्मीर को लेकर जो शुरु में ही विवाद शुरु हुआ , उसका मुख्य कारण यह था कि पंडित नेहरु रियासत को दूसरी रियासतों की तरह सामान्य रियासत न मान कर उसे अलग मानते थे । अलग मानने का उनका कारण यह था कि इस रियासत में मुसलमानों की संख्या हिन्दू-सिक्खों, गुज्जरों, शियाओं और जनजातियों के मुक़ाबले ज़्यादा थी । नेहरु इसे हिन्दू और मुसलमान के अनुपात के हिसाब से देख रहे थे । जबकि भीम राव आम्बेडकर मानते थे कि कांग्रेस की यह दृष्टि दूषित है और इसी के चलते कांग्रेस मुसलमानों का तुष्टीकरण करते करते देश विभाजन तक पहुँच गई । कांग्रेस की भी और नेहरु की भी शुरु से ही यह राय थी कि भारतीय रियासतों के लोगों की राय जान लेनी चाहिये कि वे वहाँ लोकतांत्रिक सरकार चाहते हैं या फिर परम्परागत राजशाही ? नेहरु ने बाद में जम्मू कश्मीर के महाराजा को एक पत्र भी लिखा जिसमें लोकमत की यह नीति स्पष्ट की गई थी लेकिन साथ ही यह लिखा कि अन्य रियासतों का अधिमिलन का प्रस्ताव इसलिये विना किसी विवाद के स्वीकार कर लिया गया है क्योंकि वहाँ के लोगों की राय कमोवेश ज्ञात ही थी । लेकिन जम्मू कश्मीर के मामले में ऐसा नहीं था । इसलिये भारत सरकार ने जम्मू कश्मीर के लोगों से वायदा किया है कि अधिमिलन को लेकर उनकी राय जानी जायेगी और इसे के आधार पर कोई अन्तिम निर्णय लिया जायेगा ।

नेहरु का यह पत्र सर्वाधिक महत्वपूर्ण है । इससे उनकी भीतरी सोच स्पष्ट होती है । बाक़ी जो रियासतें देश की नई संघीय सांविधानिक व्यवस्था में शामिल हुईं थीं , उनमें से किसी में भी लोकमत नहीं लिया गया था । फिर नेहरु ने कैसे कहा कि उन सभी रियासतों के लोगों की राय का पता ही था । आख़िर बिना मतदान करवाये नेहरु को लोगों की राय का पता कैसे चल गया ? उसका एक ही उत्तर है कि इन सभी रियासतों में रहने वाले लोग हिन्दू ही थे । इसलिये नेहरु ने स्वाभाविक ही मान लिया कि हिन्दू तो भारत की संघीय सांविधानिक व्यवस्था में ही शामिल होगा । फिर जम्मू कश्मीर के मामले में नेहरु ऐसा क्यों नहीं मानते थे ? क्योंकि जम्मू कश्मीर में बहुमत मुसलमानों का था । इसका मतलब हुआ कि नेहरु यह मान कर चल रहे थे कि स्वाभाविक रीति से मुसलमान , हिन्दुस्तान में शामिल होने के लिये तैयार नहीं हैं । इसलिये इन से यह जान लेना जरुरी है कि वे पाकिस्तान में जाना चाहते हैं या हिन्दुस्तान में रहना चाहते हैं । दरअसल शत् प्रतिशत यही सोच मोहम्मद अली जिन्ना की थी । जिन्ना भी यही मान कर चलते थे कि मुसलमान हिन्दुस्तान में नहीं रह सकते । इसी लिये उन्हें पाकिस्तान नाम से अलग देश चाहिये था । मोटे तौर पर नेहरु और जिन्ना दोनों ही हिन्दू मुसलमान के प्रश्न पर एक ही तरीक़े से सोच रहे थे और वे इसे हिन्दुओं और मुसलमानों का भी स्वाभाविक व्यवहार मान कर चल रहे थे । अपनी सोच में दोनों ही ग़लत थे । जिन इलाक़ों में मुसलमान बहुमत में थे , वे तो हिन्दुस्तान से बिल्कुल ही अलग नहीं होना चाहते थे ।

यही कारण था कि जब मुस्लिम लीग पाकिस्तान बनाने की माँग को लेकर चुनाव लड़ रही थी तो मोटे तौर पर वह मुस्लिम बहुल क्षेत्रों ख़ैबर पख्तूनख्वा और पंजाब दोनों ही जगह पराजित हुई और वहाँ कांग्रेस जीती जो पाकिस्तान बनाने का विरोध कर रही थी । यदि ये दोनों मुस्लिम बहुल इलाक़े पाकिस्तान विरोधी थे तो जम्मू कश्मीर, यहाँ लगभग ७७ प्रतिशत मुसलमान थे वे पाकिस्तान में जाने के समर्थक कैसे हो सकते थे ? नेहरु को जैसे अन्य रियासतों के लोकमत का स्वाभाविक ही पता चल गया तो वह सूत्र तो जम्मू कश्मीर पर और आसानी से लागू होता था । लेकिन नेहरु ऊपर से अपना इमेज जैसा मर्ज़ी बना कर रखते हों , भीतर से वे यही मान कर चलते थे कि आम मुसलमान पाकिस्तान के साथ है । लेकिन उनकी इच्छा जरुर थी कि भारत अखंड रहे । उसमें तो वे सफल नहीं हो पाये । फिर उनकी इच्छा थी कि जम्मू कश्मीर हिन्दुस्तान की सांविधानिक व्यवस्था का हिस्सा बने । इसमें कोईँ दिक़्क़त नहीं थी । महाराजा हरि सिंह जो कश्मीर के शासक थे और वैधानिक दृष्टि से निर्णय लेने के अधिकारी थे , वे भी भारत में ही रहने के इच्छुक थे और कश्मीर घाटी के लोग पाकिस्तान में जाने के बिल्कुल पक्ष में नहीं थे ।

लेकिन नेहरु अपनी उसी साम्प्रदायिक सोच के कारण यह मान कर चल रहे थे कि वे मुसलमान होने के कारण पाकिस्तान जाने के इच्छुक हैं । ऐसी मानसिक अवस्था में उन्हें कोई ऐसा मुसलमान चाहिये था जो उन्हें विश्वास दिला दे कि कश्मीर घाटी के लोग हिन्दोस्तान में रहने के इच्छुक हैं । यदि कोई ऐसा मुसलमान उन्हें मिल जाता तो उसे वे मुंहमांगा इनाम देने के लिये तैयार थे । इस हालत में उन्हें शेख़ अब्दुल्ला मिल गये । शेख़ अब्दुल्ला ने उन्हें विश्वास दिला दिया कि वे कश्मीर घाटी के मुसलमानों को हिन्दुस्तान में ही रहने के लिये तैयार कर सकते हैं । अन्धा क्या माँगे दो आँखे । नेहरु ने शेख़ अब्दुल्ला को आगे करके नीति और निर्णय दोनों क्षेत्रों में काम शुरु कर दिया और शेख़ अब्दुल्ला ने इसकी मुंहमांगी क़ीमत माँगनी और लेनी शुरु कर दी । नेहरु यह भूल गये कि कश्मीर घाटी के लोग भारत में रहने के लिये तैयार थे , इसका कारण शेख़ अब्दुल्ला नहीं थे बल्कि इसका कारण कश्मीर घाटी का इतिहास और वहाँ के लोगों का मनोविज्ञान था ।

जम्मू कश्मीर रियासत के भारतीय सांविधानिक व्यवस्था में अधिमिलन के लिये प्रयास तो सितम्बर १९४७ से महाराजा हरि सिंह भी कर रहे थे । लेकिन नेहरु उनके हाथों यह अधिमिलन स्वीकार करने के लिये तैयार नहीं थे । क्योंकि उनको तो शेख़ अब्दुल्ला के हाथों अधिमिलन का प्रस्ताव चाहिये था ताकि वे सिद्ध कर सकें कि एक मुसलमान नेता , मुस्लिम बहुल रियासत को , मुस्लिम राज्य पाकिस्तान को छोड़ कर हिन्दुस्तान में अधिमिलन के लिये प्रस्ताव कर रहा है । नेहरु की नज़र में यह चमत्कार था । नेहरु इसे अपने व्यक्तित्व का मुसलमानों पर प्रभाव समझ रहे थे और इस चमत्कार को इस प्रभाव का परिणाम मान रहे थे । यदि महाराजा हरि सिंह के प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया जाता तो यह चमत्कार नहीं कहला सकता था । क्योंकि फिर तो यही कहा जाता कि एक हिन्दू राजा को भारतवर्ष को छोड़ कर और कहाँ जानाथा ? नेहरु राजनीति के मैदान में तो जिन्ना से बुरी तरह पराजित हो गये थे लेकिन अब शेख़ अब्दुल्ला के माध्यम से कश्मीर के अधिमिलन का प्रस्ताव स्वीकार करके सिद्धान्त के स्तर पर उसे पराजित करना चाह रहे थे । शेख़ अपनी इस भूमिका के लिये क़ीमत बसूलते जा रहे थे । नेहरु के इस प्रयोग के कारण पूरा जम्मू कश्मीर ही ख़तरे में पड़ गया था । लेकिन नेहरु जम्मू कश्मीर में भी मुसलमानों के तुष्टीकरण की पुरानी नीति पर चल पड़े थे , जिस नीति के कारण भारत विभाजन तक की नौबत आ गई थी । इस पृष्ठभूमि में बाबा साहेब आम्बेडकर के कश्मीर नीति को लेकर विचार महत्वपूर्ण हैं ।

आम्बेडकर जम्मू कश्मीर के लिये संघीय संविधान में अनुच्छेद ३७० के प्रावधान के पक्ष में नहीं थे । जब नेहरु के सुझाव पर शेख़ अब्दुल्ला आम्बेडकर के पास गये ताकि उन्हें अनुच्छेद ३७० के लिये सहमत कर सकें तो उन्होंने शेख़ को उल्टे पाँव लौटा दिया । आम्बेडकर ने कहा कि मैं विधि मंत्री भारत का हूँ । मैं उसके राष्ट्रीय हितों से विश्वासघात नहीं करूँगा । संविधान सभा में यह प्रस्ताव गोपालस्वामी आयंगर को रखना पड़ा था ।

केन्द्रीय मंत्रिमंडल से त्यागपत्र देने के बाद १० अक्तूबर १९५१ को आम्बेडकर ने त्यागपत्र के कारणों को लेकर जो वक्तव्य दिया , उसमें नेहरु की इस उपर लिखित कश्मीर नीति पर ही सवाल उठाये गये हैं । आम्बेडकर ने अपने लम्बे वक्तव्य में लिखा, "प्रधानमंत्री का सारा समय और ध्यान केवल मुसलमानों की सुरक्षा के लिये जाता है । मैं इसके विरुद्ध नहीं हूँ । परन्तु क्या हिन्दुस्तान में केवल मुसलमान ही बचे हैं जिन्हें सुरक्षा की जरुरत है ? अनुसूचित जाति/जनजाति ---- का क्या ? इनको तो मुसलमानों से भी ज़्यादा सुरक्षा चाहिये । " आम्बेडकर की भाषा चाहे नर्म है लेकिन वेदना पुरानी है जब उन्होंने महात्मा गान्धी से कहा था कि आप मुसलमानों को तो कोरें चैक पर हस्ताक्षर करके सब कुछ देने के लिये तैयार हो , लेकिन दलित समाज के लिये हाथ क्यों खींच लेते हैं ?लेकिन इस बार आम्बेडकर यह प्रश्न इसलिये उठा रहे थे क्योंकि उनको लगता था कि अब नेहरु तुष्टीकरण की नीति का जम्मू कश्मीर में खेल खेल रहे थे ।

 नेहरु अपनी आदर्शवादिता में जम्मू कश्मीर के प्रश्न को संयुक्त राष्ट्र संघ में ले गये थे । आम्बेडकर इसके पक्ष में नहीं थे ।  लेकिन भारत का पक्ष न्याय पूर्ण होते हुये भी दुनिया का एक भी देश सुरक्षा परिषद में भारत के पक्ष में खड़ा नहीं हुआ । भारत की विदेश नीति , जिसके जनक स्वयं नेहरु थे , अपनी असफलता का रोना सुरक्षा परिषद में रो रही थी । आम्बेडकर अपने वक्तव्य में कहते हैं," जिसने मुझे केवल असन्तोष ही नहीं दिया बल्कि सचमुच चिन्ता में डाल दिया है , वह देश की विदेश नीति है । जो भी हमारी विदेश नीति को लगातार देखता रहा है और साथ ही दूसरे देशों की भारत के प्रति नीति को देखता रहा है , वह यह देखें बिना नहीं रह सकता कि सभी देशों की नीति में भारत को लेकर अचानक परिवर्तन हुआ है । पन्द्रह अगस्त 1947 को जब हम ने आज़ाद देश के तौर पर अपनी यात्रा प्रारम्भ की थी तो सभी देशों की सद्भावना हमारे साथ थी । दुनिया का हर देश हमारा मित्र था । आज केवल चार साल के बाद ही हमारे सभी मित्र हमें छोड़ गये हैं । हमारा कोई भी मित्र नहीं है । हमने अपने आप को अकेले कर लिया हैं । संयुक्त राष्ट्र संघ में हमारे प्रस्तावों का समर्थन करने वाला एक देश भी नहीं है । जब मैं अपने देश की विदेश नीति के बारे में सोचता हूँ तो मुझे बिस्मार्क और बर्नाड शाह के शब्द ध्यान में आते हैं । बिस्मार्क ने कहा था कि राजनीति आदर्श स्थिति की प्राप्ति का खेल नहीं है बल्कि वह संभावनाओं की प्राप्ति का खेल है । बहुत समय नहीं बीता , जब बर्नाड शाह ने कहा था कि अच्छे आदर्शों की सराहना की जानी चाहिये लेकिन यह कभी नहीं भूलना चाहिये कि कभी कभी बहुत अच्छे बनना भी बहुत ख़तरनाक सिद्ध होता है । हमारी विदेश नीति विश्व की इन दो महान विभूतियों की नसीहत के बिल्कुल विपरीत है ।" ज़ाहिर है कि बाबा साहेब संयुक्त राष्ट्र संघ में देश की जिस विदेश नीति की विफलता पर चिन्ता प्रकट कर रहे हैं , वह जम्मू कश्मीर के प्रश्न को लेकर ही है । उन दिनों भारत का यही मामला लेक सक्सैस में अटका हुआ था और वहाँ हम अकेले पड़ गये थे ।

इसे आगे स्पष्ट करते हुये आम्बेडकर ने अपने वक्तव्य में लिखा," पाकिस्तान से हमारी लड़ाई हमारी विदेश नीति का ही हिस्सा है , जिससे मैं पूरी तरह असन्तुष्ट हूँ । पाकिस्तान के साथ हमारे ख़राब रिश्तों के दो मुख्य कारण हैं । पहला कश्मीर और दूसरा पूर्वी बंगाल में हमारे लोगों की दयनीय स्थिति ।" उसके बाद आम्बेडकर कहते हैं कि भारत सरकार वरीयता कश्मीर के मामले को दे रही है , जबकि उसे वरीयता पूर्वी बंगाल के मसले को देनी चाहिये । समाचार पत्रों में ख़बरें छप रही हैं , उनके अनुसार पूर्वी बंगाल में हमारे लोगों की स्थिति कश्मीर से भी ज्यादा असहनीय होती जा रही है । पूर्वी बंगाल में हिन्दुओं की स्थिति पर चिन्ता प्रकट करने के बाद वे कश्मीर की ओर आते हैं । कश्मीर पर उनके बयान को निम्न खंडों में विभाजित किया जा सकता है-

"कश्मीर में विवाद का मुख्य मुद्दा , कौन ग़लत है और कौन ठीक है , इसी को लेकर है । लेकिन मेरे विचार में मुख्य प्रश्न यह नहीं है कि कौन ठीक है । मुख्य प्रश्न है कि क्या ठीक है ? यदि यह सिद्धान्त मान लिया जाये कि क्या ठीक है , तो मेरी राय में , कश्मीर का विभाजन ही ठीक है । जैसे हमने हिन्दू और मुसलमान के आधार पर देश को ही बाँट लिया है , उसी के आधार पर हिन्दू-बौद्ध हिस्से भारत में रहें और मुस्लिम हिस्से पाकिस्तान में चले जायें । हमें कश्मीर के मुस्लिम हिस्से की चिन्ता नहीं करनी चाहिये । यह कश्मीर के मुसलमानों और पाकिस्तान के बीच का मामला है । वे इस प्रश्न पर जैसा भी निर्णय करना चाहें , ले सकते हैं । यदि आपको ठीक लगता है , तो पूरा क्षेत्र तीन हिस्सों में बाँटा जा सकता है । युद्ध विराम ज़ोन , कश्मीर घाटी और जम्मू-लद्दाख ज़ोन । इसमें से भी जनमत संग्रह केवल कश्मीर घाटी में ही करवाया जाना चाहिये । मुझे सबसे ज़्यादा डर इस बात का है कि प्रस्तावित जनमत संग्रह , जो समग्र जनमत संग्रह बन जाता है , में तो हिन्दुओं और बौद्धों को बिना उनकी इच्छा के बलपूर्वक पाकिस्तान में धकेल देना ही माना जा सकता है । इससे हमें कश्मीर में भी उन्हीं समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है जो हम इतने अरसे से पूर्वी बंगाल में सामना कर रहे थे ।"

उपरोक्त बयान के अनुसार आम्बेडकर के सुझावों के अनुसार- जम्मू और लद्दाख को छोड़ कर केवल कश्मीर घाटी में जनमत संग्रह करवाना चाहिये । कश्मीर के विभाजन का भी सुझाव है । लेकिन इस सुझाव के पीछे कारण क्या है ? आम्बेडकर को डर है कि यदि सारे जम्मू कश्मीर राज्य में जनमत संग्रह करवाया जाता है तो हो सकता है उसका परिणाम पाकिस्तान के पक्ष में चला जाये और इसके चलते सारा जम्मू कश्मीर ही पाकिस्तान को देना पड़ेगा । इसके कारण राज्य के हिन्दु और बौद्धों की हालत पूर्वी बंगाल के हिन्दुओं से भी वदतर हो जायेगी । जिन दिनों आम्बेडकर यह चिन्ता प्रकट कर रहे थे , उन दिनों नेहरु की कश्मीर नीति के चलते , लगभग सभी का यही डर था । जम्मू कश्मीर के एक राजनैतिक दल प्रजा परिषद ने तो इन्हीं आशंकाओं के चलते पूरे राज्य में आन्दोलन छेड़ रखा था । डा० श्यामा प्रसाद मुखर्जी तक इन आकांक्षाओं से चिन्तित थे । यह चिन्ता इसलिये भी बढ़ गई थी कि भारत के गवर्नर जनरल लार्ड माऊंटबेटन ख़ुद, किसी भी क़ीमत पर जम्मू कश्मीर पाकिस्तान को देने के षड्यंत्र रचते रहते थे । माऊंटबेटन परिवार से नेहरु की पारिवारिक मित्रता के चलते सदा ख़तरा बना रहता था कि रियासत में कुछ भी हो सकता है । वैसे भी अंग्रेज़ सरकार तो उन प्रान्तों को जो मुस्लिम बहुल थे , पाकिस्तान को देने के लिये आमादा थी । पंजाब और बंगाल पूरे का पूरा पाकिस्तान में जाये , यही ब्रिटिश नीति थी । यह तो मास्टर तारा सिंह और डा० श्यामा प्रसाद मुखर्जी को श्रेय जाता है कि उन्होंने पंजाब और बंगाल को पाकिस्तान में जाने से बचाने के लिये उन्हें विभाजित करवाया और आधा आधा प्रान्त भारत में ही बना रह सका । इस लिहाज़ से जम्मू कश्मीर की हालत भी बंगाल और पंजाब जैसी ही थी । डा० आम्बेडकर उसका भी पंजाब और बंगाल की तर्ज़ पर विभाजन करवा कर उसके बौद्ध और हिन्दू हिस्से बचा लेना चाहते थे ।

साधारण परिस्थितियों में महाराजा हरि सिंह द्वारा रियासत को वैधानिक तरीक़े से देश की नई सांविधानिक व्यवस्था में शामिल किये जाने के पश्चात् जम्मू कश्मीर का प्रश्न ख़त्म हो जाना चाहिये था । क्योंकि क़ानून के अनुसार यह अधिकार महाराजा हरि सिंह के पास ही था । लेकिन दुर्भाग्य से पंडित नेहरु ने इस स्पष्ट स्थिति के बाद भी जम्मू कश्मीर मसले को उलझा नहीं दिया था बल्कि उस पर निर्णय लेने का अधिकार भी संयुक्त राष्ट्र संघ में शीत युद्ध लड़ रही शक्तियों के हाथ में दे दिया था । जनमत संग्रह की अवधारणा तो संघीय संविधान की आधारभूत भावना के भी विपरीत थी । नेहरु अपनी ज़िद के चलते , देश में घूम घूम कर यह घोषणा कर रहे थे कि यदि जनमत संग्रह का परिणाम विपरीत गया तो जम्मू कश्मीर भारत का अंग नहीं रहेगा । इसके कारण केवल भीम राव आम्बेडकर के मन में ही नहीं , अनेक अन्य राष्ट्रभक्त नेताओं के मन में जम्मू कश्मीर के भविष्य को लेकर , ख़ास कर वहाँ के हिन्दु-सिक्ख , बौद्ध , गुज्जर , शिया इत्यादि के भविष्य को लेकर चिन्ता होने लगी थी । १९५१ के उस हालात में रियासत के विभाजन का सुझाव देकर आम्बेडकर अपनी यथार्थ चिन्ताओं की ही अभिव्यक्ति कर रहे थे ।

उन दिनों अपने भाषणों में आम्बेडकर बार बार कहा करते थे कि यदि हम पूरे कश्मीर को नहीं बचा सकते तो कम से कम हम अपने "Kith and Kin" को तो बचा लें । जम्मू व लद्दाख को वे किथ एंड किन ही मानते थे । बाबा साहेब कहा करते थे कि कश्मीर पर शूद्र वंश का राज्य था । इसलिये कश्मीर शूद्रों के लिये महत्वपूर्ण भूमिका रखता है । लेकिन दुर्भाग्य से वही कश्मीर नेहरु की नीति के कारण ख़तरे में पड़ गया था । जिन दिनों बाबा साहेब आम्बेडकर जम्मू कश्मीर के विभाजन की बात कर रहे थे , उन जिनों देश में आम चर्चा थी कि नेहरु माऊंटबेटन और शेख़ अब्दुल्ला के चक्कर में पड़कर सारे रियासत को खो देंगे । जिस रियासत को पाकिस्तान के चंगुल से बचाने के लिये महाराजा हरि सिंह ने वायसराय का इतना ज़बरदस्त जबाव झेला , जिन्ना के दबाव और धमकियों को झेला , मुस्लिम लीग और मुस्लिम कान्फ्रेंस की धमकियों के आगे झुकने से इन्कार कर दिया , जिस के लिये जम्मू कश्मीर रियासत के सेनापति राजेन्द्र सिंह ने अपने प्राण अर्पित कर दिये , मक़बूल शेरबानी कबायलियों की गोलियों के शिकार हो गये , उस रियासत का , माऊंटबेटन और लेडी माऊंटबेटन के चक्कर में आकर नेहरु ने युद्ध विराम सन्धि से पहले ही विभाजन कर दिया था । गिलगित बल्तीस्तान और पुँछ से नौशहरा तक की पंजाबी भाषी पट्टी पाकिस्तान के क़ब्ज़े में रहने दी थी और अब शेख़ अब्दुल्ला की अति महत्वकांक्षाओं के चलते मुस्लिम तुष्टीकरण को अपना रहे थे । सभी को आशंका थी कि नेहरु सारा जम्मू कश्मीर ब्रिटेन की साम्राज्यवादी नीतियों के चलते गँवा बैठेंगे और भारत का पश्चिमोत्तर सीमान्त फिर असुरक्षित हो जायेगा ।

उस समय आम्बेडकर रियासत के विभाजन की जो बात कर रहे थे , वह इन्हीं आकांक्षाओं के चलते पैदा हुई थी । ये आशंकाएँ केवल बाबा साहेब आम्बेडकर की ही नहीं थीं , बल्कि ये डा० श्यामा प्रसाद मुखर्जी , डा० राजेन्द्र प्रसाद , मास्टर तारा सिंह , प्रेम नाथ डोगरा सभी की थी । इसे क्या कहा जाये कि नेहरु की नीतियों के चलते जम्मू कश्मीर में अब तक भी कोई न कोई बखेड़ा खड़ा रहता है । नेहरु उस समय कश्मीर के लोगों से संवाद रचना नहीं कर रहे थे बल्कि शेख़ अब्दुल्ला जैसे बिचौलियों के माध्यम से कश्मीर से संवाद करना चाह रहे थे । जैसा कि होता ही है बिचौलिए इसकी क़ीमत बसूल रहे थे और कश्मीर के लोग स्वयं को अपमानित महसूस कर रहे थे । बाबा साहेब आम्बेडकर सीधे सम्वाद के पक्ष में थे । वे कश्मीर के मुसलमानों की चर्चा इसी सन्दर्भ में करते प्रतीत होते हैं । बाबा साहेब मानते थे कि जम्मू कश्मीर में मुस्लिम मिल तुष्टीकरण से समाधान नहीं निकलेगा बल्कि इस साम्प्रदायिकता से बच कर ही समाधान निकल सकता है ।