दर्शनों का संगम है अभिनवगुप्त

 
आचार्य अभिनवगुप्त के चित्र का दिल्ली विश्वविद्यालय की आर्ट्स फैकल्टी में विमोचन हुआ
 अभिनवगुप्त के चिंतन में भारतीय दर्शन की विभिन्न धाराओं का सकारात्मक संश्लेषण है। इस चिंतन में आगम-निमग, शैव-शाक्त, योग- सौंदर्य , ब्रह्म और जगत सभी के लिए स्थान है। इसीलिए, उनका प्रत्यभिज्ञा दर्शन बहुत समावेशी दर्शन है। वह जगत और ब्रह्म के बीच विभाजन नहीं करते बल्कि प्रत्येक अस्तित्व को ब्रह्म का विस्तार ही मानते हैं। आज जब पूरी दुनिया में एक संतुलित और समग्र जीवनशैली और जीवनदर्शन की मांग जोर पकड़ रही है तो अभिनवगुप्त के दर्शन की प्रासंगिकता बढ़ जाती है …

कश्मीरी जनमानस की अभिनवगुप्त से जुड़ी एक रोचक मान्यता के अनुसार अपने जीवन का लक्ष्य पूरा करने के बाद वह एक दिन अपने बारह सौ शिष्यों सहित भैरव गुफा में प्रविष्ट हो गए तथा फिर कभी बाहर नहीं निकले। लोगों की मान्यता है कि भैरव गुफा में प्रवेश के बाद अभिनवगुप्त शिव से एकाकार हो गए थे। इस परिघटना को 2016 में एक हजार साल पूरे होने वाले हैं…

आचार्य अभिनवगुप्त एक उत्कट साधक, श्रेष्ठ दार्शनिक और कश्मीर शैवदर्शन के आचार्य थे। उनके दर्शन में शैव-शाक्त मान्यताओं का सुंदर समन्वय देखने को मिलता है। इसके अतिरिक्त उनका दर्शन लोक, वेद और तंत्र, तीनों का स्पर्श करता है। काव्य शास्त्रीय ‘ध्वन्यालोक’ पर इनकी टीका ‘ध्वन्यालोक लोचन’ तथा ‘नाट्यशास्त्र’ की टीका ‘अभिनव भारती’ को बहुत ख्याति मिली है। ‘प्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी’ ‘तंत्रलोक’ इत्यादि इनकी प्रसिद्ध दार्शनिक कृतियां हैं। भारतीय समीक्षाशास्त्र एवं सौंदर्यमीमांसा पर अभिनवगुप्त का अमिट प्रभाव है। साथ ही तत्त्व चिंतन परंपरा में भी उनका स्थान अविस्मरणीय है। ऐसा माना जाता है कि कन्नौज के प्रव्र्रजित शैव मनीषी अविगुप्त, अभिनवगुप्त के प्रथम पूर्वज हैं। उसके अनंतर लगभग डेढ़ सौ वर्ष तक का कालखंड उस वंश परम्परा के विषय में मौन सा है। इसके पितामह वराह गुप्त का जन्म ईसा की दसवीं शताब्दी के प्रथम चरण में माना जाता है। उनके पिता नरसिंह गुप्त अत्यंत मेधावी विद्वान तथा परम शिव भक्त थे। उनकी माता विमलकला परम साध्वी एवं धार्मिक महिला थीं। दुर्भाग्य से उनकी छाया इनके ऊपर से बचपन में ही उठ गई। इसके अतिरिक्त उनकी एक महान गुरु परंपरा थी। उन्होंने प्रत्येक विषय की शिक्षा अपने विषय में निष्णात गुरुओं से पाई। उस समय कश्मीर और कश्मीर के आसपास के विद्या विशेष के उद्भट विद्वानों के पास जाकर उन्होंने अध्ययन किया। व्याकरण की शिक्षा उन्होंने अपने पिता नरसिंह गुप्त से प्राप्त की। वामनाथ से द्वैताद्वैत तंत्र, भूतिराजतनय से द्वैतवादी शैव वाद, लक्ष्मणगुप्त से प्रत्यभिज्ञा एवं त्रिकदर्शन, भट्ट इंदुराज से ध्वनि सिंद्धांत, भूमिराज से ब्रह्मविद्या और भट्टा तोत से नाट्य शास्त्र की शिक्षा प्राप्त की। गुरु उनकी कुशाग्र बुद्धि, धारणाशक्ति एवं प्रतिपादन शैली से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने उनको सर्वाचार्य घोषित कर दिया और आगे चलकर अपने शैव तत्त्व चिंतन तथा साधना के आधार पर वह महामाहेश्वराचार्य हो गए। उनकी ज्ञानपिपासा इतनी तीव्र थी कि वह उसको शांत करने के लिए देश के कोने-कोने में घूमते रहे। इस संदर्भ में जालंधर के आचार्य शंभुनाथ का नाम लिया जा सकता है, जिनसे उन्होंने कुलशास्त्र का अध्ययन किया। यह भी कहा जाता है कि वस्तुतः इन्हीं के संसर्ग से अभिनव को शांति मिली और अंततोगत्वा आत्मसाक्षात्कार हुआ। कश्मीर के परिवारों में एक किंवदंती प्रचलित है कि अपने जीवन का लक्ष्य पूरा करने के बाद वह एक दिन अपने बारह सौ शिष्यों सहित भैरव गुफा में प्रविष्ट हो गए तथा फिर कभी बाहर नहीं निकले। उन्होंने आजीवन ब्रह्मचर्य का व्रत ले लिया और उसका पूरा निर्वाह किया। इसका एक लाभ यह हुआ कि उनमें एक अपूर्व संकल्प जागा। व्युत्पन्न वह थे ही, शक्ति का उन्मेष हुआ और एक महान कृतित्व फूट निकला।

दार्शनिक सिद्धांत :

प्रत्यभिज्ञा दर्शन

अभिनवगुप्त ने किसी मौलिक दर्शन का प्रतिपादन नहीं किया लेकिन उनका दर्शन इतना संश्लेषणात्मक है कि वह मौलिक और नया जैसा लगता है। गुरु परंपरा से प्राप्त क्रम, कुल एवं त्रिक अथवा प्रत्यभिज्ञा शास्त्र को उनकी विस्तृत व्याख्याएं एक नए क्षितिज पर लाकर खड़ा कर देती हैं। अतः यह कहना सर्वथा उपयुक्त होगा कि त्रिक उनका सर्वप्रिय दर्शन था और इस क्षेत्र को उनकी विशेष देन है। विश्व के रहस्य को समझने का प्रयास ही वस्तुतः दर्शन है। यह क्या है, यह विश्व अस्तित्व में कैसे आया तथा उसके पीछे कौन सी नियामक शक्ति कार्य करती है आदि समस्याओं के समाधान के प्रयास ने अनेक दार्शनिक अवधारणाओं को जन्म दिया है। प्रत्यभिज्ञा दर्शन के अनुसार यह विश्व छत्तीस तत्त्वों से मिलकर बना है। महेश्वर अर्थात परम सत्ता, जिसे चित्ति भी कहा जाता है, अपनी स्वतंत्र इच्छा से अपने मानस पटल (भित्ति) पर इन्हीं तत्त्वों को कभी समवेत रूप में प्रकट कर देता है, और कभी अपने में समेट लेता है। इसी को दूसरे शब्दों में उन्मीलन तथा निमीलन कहते हैं। महेश्वर अथवा शिव के उस पूरे कार्य कलाप को पंचकृत्य (सृष्टि, स्थिति, संहति, विलय तथा अनुग्रह) की संज्ञा दी जाती है। शिव यह सब कुछ अपनी इच्छा से करता है, इसलिए यह उसकी स्वातंत्र्य शक्ति कहलाती है। इसी को माहेश्वर्य शक्ति अथवा विमर्श भी कहते हैं। विमर्श का अभिप्राय है- सक्रियता। अद्वैत वेदांत के ब्रह्म की भांति इस दर्शन की परमसत्ता, शिव, केवल प्रकाशमय ही नहीं अपितु प्रकाश विमर्शमय है। यह ज्ञान और क्रिया दोनों का अधिष्ठान तथा दोनों का स्रोत है।

यह विश्व उसके लिए कोई नई रचना नहीं, बल्कि पहले से ही विद्यमान वस्तु प्रकटीकरण है। निष्कर्ष यह है कि यह दर्शन न तो किसी वस्तु को मिथ्या मानता है और न ही क्षणिक। इसकी दृष्टि में प्रत्येक वस्तु की अपनी सत्ता है, बल्कि सत्ता ही वस्तु की नियामक है। अर्थात यदि वस्तु है तो उसकी सत्ता अवश्य होगी और यदि उसकी सत्ता नहीं है तो वह वस्तु ही नहीं है। इनके अनुसार तो वस्तु, वस्तु का कर्ता और वस्तुबोध का माध्यम तीनों ही यथार्थ हैं। यही शैव स्वातंत्र्यवाद है और इसी की स्थापना आचार्य अभिनवगुप्त ने अपने गूढ़ चिंतन द्वारा की। इस प्रकार अभिनवगुप्त ने शंकर के मिथ्यवाद तथा बौद्धों के क्षणिकवाद दोनों को ही निरस्त कर दिया। इसी प्रकार आत्मतत्त्व बोध के साधन के लिए जो मार्ग इस दर्शन ने सुझाया है, वह केवल ज्ञान नहीं अपितु प्रत्यभिज्ञान है। ज्ञान तो किसी अज्ञात वस्तु का होता है। इसके विपरीत, प्रत्यभिज्ञान का अभिप्राय है किसी पूर्व वस्तु की पहचान। शंकर वेदांत और त्रिकशास्त्र की आत्मतत्त्व-विमर्श संबंधी धारणा में यही मौलिक अंतर है।

अभिनवगुप्त का अवदान

अभिनवगुप्त मुख्यतः शैवमार्गी हैं। उन पर तंत्र चिंतन का भी गहरा प्रभाव है। परंतु उनकी प्रमुख पहचान प्रत्यभिज्ञा दर्शन ही है। उत्पल की ईश्वर प्रत्यभिज्ञा पर दो विस्तृत व्याख्याएं तथा तंत्रलोक जैसा बृहद् ग्रंथ देकर अभिनवगुप्त ने भारतीय दर्शन जगत को एक नई ऊंचाई पर पहुंचा दिया। इसी प्रकार ध्वन्यालोकलोचन के तर्क भी नितांत अभिनव प्रतीत होते हैं। उत्पल ने प्रत्यभिज्ञाशास्त्र का प्रणयन तो लोक हित के लिए ही किया था, लेकिन जटिलता और सूत्रवत शैली के कारण आम लोगों तक यह दर्शन पहुंच नहीं सका। अभिनवगुप्त ने अपनी विस्तृत तथा स्पष्ट व्याख्याओं के द्वारा उसे सामान्यजन तक पहुंचाने का प्रयास किया। अपनी विवृतिविमर्शिनी की रचना के पीछे उनका लक्ष्य उत्पलदेव के विचारों को उजागर करना मात्र रहा है। इस प्रकार अपने पूरे के पूरे क्रिया काल में उन्होंने उत्पल के सिद्धांतों का ही अनुसरण किया है तथा कहीं अपने सिद्धांत जोड़ने का प्रयास नहीं किया है। किंतु इतना हम निसंकोच कह सकते हैं कि प्रत्यभिज्ञाशास्त्र तथा नाट्यशास्त्र के विषय में हम जो कुछ भी जानते हैं, उस सब का श्रेय उनकी विस्तृत व्याख्याओं को ही जाता है। सोमानंद, उत्पल तथा भरत के ग्रंथों की शैली इतनी सूत्रात्मक एवं पांडित्यपूर्ण थी कि अभिनव की व्याख्याओं के बिना इन्हें समझना एक दुष्कर कार्य होता। अतः अपने पूर्व आचार्यों के प्रति श्रद्धालु तथा उनके विचारों के प्रति प्रतिबद्ध होने के बावजूद अभिनव ने भारतीय दर्शन की लोकानुभूतिपरक व्याख्या की, उसी के कारण यह दर्शन आम लोगों तक पहुंच सका। विभिन्न भारतीय दर्शनों के मध्य संपर्क स्थापित कराने वाली अवधारणाओं को गढ़ने तथा उनके संश्लेषण का श्रेय भी अभिनवगुप्त को जाता है।