प्रायोजित विन्दुओं से बाहर निकले जम्मू-कश्मीर का विमर्श


धर्मशाला, 09 अक्टूबर। जम्मू-कश्मीर में व्याप्त समस्या देश के भूभाग का नहीं, बल्कि अस्मिता का प्रश्न है। हमें इस समस्या से निपटने के लिए कुछ तत्वों की ओर से प्रायोजित मुद्दों से बाहर निकलकर बात करने की आवश्यकता है। वरिष्ठ पत्रकार और जम्मू-कश्मीर मामलों के विद्वान जवाहर लाल कौल ने यह बात केंद्रीय विश्वविद्यालय हिमाचल प्रदेश में आयोजित सेमिनार जम्मू-कश्मीर नव विमर्श में कही। कौल ने कहा कि देश के इस मुकुट राज्य में जो समस्याएं विद्यमान हैं, वह श्रीनगर की नहीं, बल्कि दिल्ली की देन हैं।

जम्मू-कश्मीर अध्ययन केंद्र के सहयोग से आयोजित गोष्ठि में कौल ने कहा कि आज स्थिति यह है कि हमें अपने इस प्रांत के उस हिस्से के बारे में जानकारी भी पश्चिमी मीडिया के जरिए मिलती है, जो पाकिस्तान के कब्जे में है। खासतौर पर पाक के कब्जे वाले कश्मीर के हिस्से गिलगित-बल्तिस्तान के रणनीतिक और सामरिक महत्व को उजागर करते हुए उन्होंने कहा कि यह हमारी चूक है कि हम वहां के लोगों की बात को नहीं सुन पा रहे हैं। जवाहर लाल कौल ने कहा कि यह राज्य कभी प्राचीन सिल्क रूट का हिस्सा हुआ करता था, लेकिन आज इसका अधिकांश भाग पाकिस्तान और चीन के कब्जे में है। जवाहर लाल कौल ने कश्मीर को भारत की सांस्कृतिक एकता विभिन्न अंग बताते हुए कहा कि इसे कभी शारदापीठ के नाम से ही जाना जाता था।

जम्मू-कश्मीर के मसले को सकारात्मक तरीके से देखे जाने की बात करते हुए उन्होंने कहा कि कुछ लोग इसे अनुच्छेद 370 तक ही समेट देना चाहते हैं। लेकिन यह अनुच्छेद अस्थायी प्रबंध है और इसे अल्पकाल के लिए ही लागू किया गया था। उन्होंने कहा कि इसे धारा 35 ए की आड़ लेकर और अधिक मजबूती दी गई और एक हद तक अनुच्छेद 370 की मूल भावना के साथ भी खिलवाड़ किया गया। यहां तक कि 35 ए को संविधान में जोड़ने के लिए संसद की मंजूरी तक नहीं ली गई। ऐसे में इसकी वैधानिकता पर सवाल खड़े होते हैं। वरिष्ठ पत्रकार ने कश्मीर की समस्या के लिए जवाहर लाल नेहरू को जिम्मेदार ठहराते हुए कहा कि उन्होंने व्यक्तिगत अहं के कारण ही इस समस्या को और बढ़ा दिया।

कौल ने कहा कि किसी भी सरकार की जिम्मेदारी होती है कि वह देश की सुरक्षा के लिए सीमाओं का पूरा ख्याल रखे, लेकिन आजादी के बाद जिन्हें सत्ता मिली, उन्होंने इस बात का ख्याल नहीं रखा। हालांकि अंग्रेज इस बारे में जागरूक थे और उन्होंने रूस, अफगान और चीन आदि के खतरे से निपटने के लिए गिलगित-बाल्टिस्तान में अपनी सेना तैनात की थी। इसके लिए उन्होंने महाराजा हरीसिंह से समझौता भी किया था।

कौल ने कहा कि कुछ लोग कश्मीर में व्याप्त मामूली समस्याओं को तूल देकर और अलगाववाद को बढ़ावा देकर इसे लड़ाई का मैदान बना देना चाहते हैं। हमें इससे बचने की आवश्यकता है। उनसे पहले जम्मू-कश्मीर अध्ययन केंद्र के अध्यक्ष आशुतोष भटनागर ने कहा कि हम कश्मीर के मसले पर छह दशकों से जिस रास्ते पर चले हैं, उसमें कोई सफलता नहीं मिली है। इसलिए हमें नए आयामों के तहत इस मामले में विमर्श करने की जरूरत है। कार्यक्रम के दौरान विश्वविद्यालय के कुलपति कुलदीप चंद अग्निहोत्री, प्रो कुलपति योगिंद्र वर्मा भी मौजूद थे। इस सेमिनार में देश के विभिन्न हिस्सों से आए अकादमिक जगत के विद्वान हिस्सा ले रहे हैं। शनिवार को इस दो दिवसीय सेमिनार का आखिरी दिन रहेगा।

अवनीश सिंह, संवाददाता, नई दिल्ली