जीतेगा लोकतंत्र

Source: JKSC      Date: 05 Dec 2014 16:07:06


पहले चरण के मतदान के साथ ही सभी दलों के निशाने पर भाजपा आ गयी है। कांग्रेस, नेशनल कांफ्रेंस और पीडीपी ही नहीं बल्कि अलगाववादी भी भाजपा को केन्द्रित करके अपनी रणनीति बना रहे हैं। भाजपा का अभी तक का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन 2008 में 11 सीटों पर विजय का रहा है।इस बार भाजपा को उम्मीद है कि वह सरकार बनाने की स्थिति तक पहुंचेगी। ऊंट किस करवट बैठेगा,यह तो 23 दिसम्बर को ही साफ हो सकेगा। लेकिन सरकार बनने या न बनने से इतर अलगाव को नकार कर पूरे राज्य को लोकतांत्रिक प्रक्रिया में उत्साह के साथ जोड़ने का श्रेय भाजपा को मिलने जा रहा है। राज्य विधानभा के वर्तमान चुनाव का सबसे बड़ा पुरस्कार यही है जिसका प्रभाव पाकिस्तान की आन्तरिक राजनीति, अंतर्राष्ट्रीय राजनय पर और दक्षिण एशिया की कूटनीति पर भी पड़ना अवश्यंभावी है।

25 नवंबर को जम्मू की किश्तवाड़, इंदरवल, डोडा, भद्रवाह, रामबन और बनिहाल, काश्मीर घाटी की गुरेज, बांदीपोरा, सोनावारी, कंगन और गंदरबल तथा लद्दाख की चारों सीटों नुब्रा, लेह, करगिल और जंस्कार के लिये पहले चरण का मतदान हुआ। 71 प्रतिशत से अधिक मतदान कर राज्य के मतदाताओं ने भविष्य के संकेत दे दिये हैँ। मतदाताओं का रुझान अंत तक बना रहा तो वर्तमान चुनाव राज्य की राजनीति की दिशा बदलने वाले सिद्ध होंगे।

पहले चरण में मतदान के बढ़े हुए प्रतिशत ने न केवल वहिष्कार की अपील करने वाले अलगाववादी संगठनों को बल्कि मुख्य धारा के राजनैतिक दलों को भी चौंकाया है। 71 प्रतिशत से अधिक मतदान से स्पष्ट है कि यह परिवर्तन का जनादेश है। स्वाभाविक ही मतदान के इस रुझान में छः साल तक सत्ता में साझेदारी करने वाली नेशनल कांफ्रेंस और कांग्रेस के लिये गंभीर चेतावनी छिपी है। अन्य राजनैतिक दलों के लिये भी यह संदेश है कि स्वतंत्रता के बाद से ही राज्य में अब तक चली आ रही भयादोहन की राजनीति का समय अब बीत गया है। छः वर्ष तक सत्ता की साझेदारी के बाद चुनाव से पहले गठबंधन तोड़ कर अनैतिकता और अराजकता का ठीकरा दूसरे दल पर फोड़ने की कलाबाजी अब और नहीं चलेगी। जनता इस बार छः सालों का हिसाब मांगने नहीं बल्कि हिसाब बराबर करने के लिये मतदान केन्द्रों पर उमड़ी है।

 

मुफ्ती मुहम्मद सईद की पीडीपी और भारतीय जनता पार्टी, दोनों ही उम्मीद कर सकती हैं कि इसका फायदा उन्हें मिलने जा रहा है। संभावना इस बात की ज्यादा है कि यह फायदा काश्मीर घाटी में पीडीपी को तो जम्मू और लद्दाख क्षेत्र में भाजपा को मिले। बढ़े हुए मतों का यदि इस प्रकार क्षेत्रवार विभाजन हुआ तो यह परिवर्तन भी पूरा परिणाम नहीं दे सकेगा। राज्य फिर एक बार गठबंधन की राजनीति के जाल में फंस जायेगा। हां, जम्मू काश्मीर राज्य में सत्ता का स्थायी तत्व बने रहने की इच्छुक कांग्रेस जरूर इस स्थिति का लाभ उठाने का प्रयास करेगी।

कश्मीर घाटी में पिछले अनेक चुनाव वहिष्कार के चलते जनता की इच्छा की अभिव्यक्ति करने में असफल रहे थे। इस बार जनता आतंकवादियों की धमकी और अलगाववादियों की चेतावनी को धता बताते हुए जिस तरह बाहर आयी है उससे यह भी उम्मीद बंधती है कि घाटी में अलगाववाद और आतंकवाद के दिन गिने-चुने ही बचे हैं। मतदान के प्रति युवाओं के उत्साह से भी इसकी पुष्टि होती है। लेकिन इसके लिये जरूरी है कि मतदाताओं का यह रुझान चुनाव के आखिरी दौर तक बना रहे। खास-तौर पर चुनाव का दूसरा और तीसरा चरण इस दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण है जब काश्मीर घाटी की अधिकांश विधानसभा सीटों के लिये मतदान होगा।

पाकिस्तान और उसकी कुख्यात खुफिया एजेन्सी आई एस आई चुनावों के दौरान राज्य में अराजकता उत्पन्न करने की कोशिश करती रही हैं। इस बार भी इसका खतरा बना हुआ है। स्थानीय आतंकवादियों की बची-खुची फौज भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराने के लिये छिट-पुट  हिंसा का सहारा ले सकते हैं। लश्करे तोएबा सहित अलगाववादियों के विभिन्न गुटों और जम्मू काश्मीर उच्च न्यायालय की बार कौंसिल ने मतदान के वहिष्कार की अपील की है। यह ठीक है किपहले चरण के मतदान वाली ज्यादातर सीटों पर अलगाववादियों के वहिष्कार का पहले भी कोई खास असर नहीं रहा है। 2008 में हुए चुनाव में इन सीटों पर कुल 61 प्रतिशत मतदान हुआ था। इस बार इसमें 10 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। लेकिन असली परीक्षा तो अलगाववादियों के वर्चस्व वाले विधानसभा क्षेत्रों में मतदान के समय होगी।

विकास के साथ कदम मिलाने के लिये इन क्षेत्रों के मतदाताओं को साहस का परिचय देना होगा। लेकिन अब यह संभव होता दिख रहा है। विशेष रूप से हुर्रियत के नेता स्व. अब्दुल गनी लोन के पुत्र सज्जाद लोन की प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से भेंट के बाद यह विश्वास किया जा सकता है कि घाटी का भी एक वर्ग अब अपने भविष्य को अलगाववादियों के हाथों बंधक बनाये रखने को तैयार नहीं है।

पूरे देश से अलग जम्मू काश्मीर की विधानसभा का कार्यकाल छः वर्ष है। 2002 और 2008 में हुए विधानसभा चुनावों में जम्मू-काश्मीर नेशनल कांफ्रेंस ने दोनों बार 28 सीटें जीतीं। मुफ्ती मुहम्मद सईद की नयी बनी पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी ने 2002 में 16 सीटों के साथ अपना खाता खोला और 2008 में उसकी सीटें बढ़कर 21 हो गयीं। 2002 में कांग्रेस ने 20 सीटें लेकर पीडीपी और निर्दलीयों के भरोसे सरकार चलायी जिसमें मुफ्ती और कांग्रेस के गुलाम नबी आजाद समझौते के तहत 3-3 साल मुख्यमंत्री रहे। 2008 में कांग्रेस ने पीडीपी का साथ छोड़ा और नेशनल कांफ्रेंस के साथ सरकार बनायी। 2002 में केन्द्र में भाजपानीत सरकार थी और नेशनल कांफ्रेंस उसके सहयोगी दल के रूप में राजग में शामिल थी। वर्तमान मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला उसमें मंत्री थे। बाद में केन्द्र में कांग्रेस की सरकार बनने पर पाला बदल कर उनके पिता फारुख अब्दुल्ला संप्रग सरकार में मंत्री बने।    

जम्मू-काश्मीर में सिद्धांतों की नहीं, सुविधा की राजनीति होती रही है, यह उपरोक्त विवरण से सिद्ध होता है। हाल ही में एक राष्ट्रीय दैनिक में छपे साक्षात्कार में उमर अब्दुल्ला ने पीडीपी पर आरोप लगाते हुए कहा कि वह सुविधा की राजनीति कर रही है। दिखावे के लिये आलोचना करते हुए भी वह भाजपा और कांग्रेस, दोनों के साथ ही चुनाव बाद गठबंधन के रास्ते खुले रखना चाहती है। इस पर जब पत्रकार ने उनकी स्वयं की योजना के बारे में पूछा तो उमर ने कहा कि वे भी जीतने वाले के साथ मिल कर सत्ता में शामिल होना चाहते हैँ। अवसरवादिता की इस राजनीति की धुरी में निस्संदेह कांग्रेस है।

अवसरवादिता की राजनीति के विरुद्ध वामपंथ औऱ दक्षिणपंथ, दोनों ने समानान्तर व्याकरण गढ़ने की कोशिश की। वास्तव में दोनों ही चाहते थे कि उनकी विचारधारा को मतदाता अपनी जरूरत मान ले। वामपंथ की यह कोशिश कुछ दूर जाकर ठहर गयी क्योंकि उनकी विचारधारा के साथ भारतीय जनमानस अपनापन अनुभव नहीं कर सका। वहीं भारतीय मूल्यों के साथ ताल-मेल बिठाना वामपंथी दर्शन के अनुकूल नहीं था। वामपंथ जहां इस ऊहा-पोह में किनारे हो गया वहीं भाजपा ने नया प्रयोग करते हुए जनता की जरूरत को ही अपना घोषणापत्र बना लिया।

विकास और गवर्नेंस इस प्रयोग के नारे बने। मतदाता ने इसे हाथों-हाथ लिया और नरेन्द्र मोदी इस प्रयोग में से नायक होकर उभरे।

गुजरात के सफल प्रयोग के बाद तमाम भाजपा शासित राज्यों में इसे दोहराया गया। 2014 के लोकसभा चुनावों में राजनीति की इस शैली पर पूरे देश ने अपनी मुहर लगा दी। वास्तव में यह व्यक्तिगत अपेक्षा, राष्ट्रीय महत्वाकांक्षा और व्यावहारिक राजनीति को एक पंक्ति में लाने की चुनौती थी जिसे मोदी ने बड़ी कुशलता से साध लिया। जम्मू काश्मीर के चुनाव में इस नयी शैली की अग्निपरीक्षा होनी है। वहां भी यदि इस राजनैतिक नवाचार की पुष्टि हो जाती है तो यह सिद्धांत के रूप में स्थापित हो जायेगा। भारतीय राजनीति में यह एक नये दौर की शुरुआत होगी।

जम्मू काश्मीर के चुनाव में जो प्रारंभिक समीकरण दिख रहे हैं उसमें भाजपा को सीधी बढ़त मिलती दिखायी दे रही है। वहीं पीडीपी को छोड़ सभी दल अपना आधार खिसकता हुआ महसूस कर रहे हैं। विकास और गुड गवर्नेंस जम्मू काश्मीर के लिये अनजाने हैं। भाजपा जब राज्य के अन्य राजनैतिक दलों को इन मुद्दों को आगे कर ललकार रही है तो इन दलों के पास फिलहाल इसका कोई तोड़ नहीं है।

जम्मू काश्मीर, खास तौर पर काश्मीर घाटी की राजनीति का मूल तत्व भारत विरोध रहा है। केन्द्र सरकार को हमलावर के रूप में यहां निरूपित किया जाता रहा है। पाकिस्तान से पैसा और प्रेरणा प्राप्त करने वाले तत्व इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहे हैं। मुख्य धारा के राजनैतिक दलों ने भी अलगाव को न केवल प्रश्रय दिया बल्कि उसे अपनी रणनीति में शामिल भी किया। केन्द्र की समर्थन खरीदने की नीति के चलते यह मुहावरा ही चल पड़ा कि आजादीमांगने पर पैकेज मिलता है। भारत विरोध को शांत करने के नाम पर केन्द्र से बेहिसाब पैसा जाता रहा और धन के इस प्रवाह में दिल्ली और काश्मीर, दोनों के ही निजी हित जुड़ गये। यह अराजकता चलती रहे, इसके लिये तमाम वैधानिक-अवैधानिक प्रावधान भी यहां लागू कर दिये गये। हिसाब देने से बचने का कारगर हथियार बन गये अनुच्छेद 370, जनमतसंग्रह, सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव जैसे जुमले।

राज्य की जनता का सभी ने भयादोहन किया। सभी ने जनता को समझाया कि अगर उन्हें नहीं चुना गया तो राष्ट्रवादी शक्तियां हावी हो जायेंगी। वे अनुच्छेद 370 खत्म कर देंगी। विशेषाधिकार समाप्त हो जायेंगे। भयादोहन का यह दौर दशकों तक चला। विडंबना यह है मीडिया और सोशल मीडिया के नये दौर में, जब सूचना से सरकारों का एकाधिकार खत्म हो चुका है और सूचना के तमाम स्रोत खुल गये हैं, राज्य के लोगों को वैचारिक रूप से बंधक बनाये रखने की प्रवृति को कड़ी चोट मिल रही है। नयी पीढ़ी पूरे भारत में जाती है और महसूस करती है कि विशेषाधिकार के छलावे ने उन्हें विकास के उन आयामों से वंचित रखा है जो देश के शेष नागरिकों के लिये सहज उपलब्ध हैं।

यहीं से वे प्रश्न उत्पन्न होते हैं जिनका उत्तर देना इन राजनैतिक दलों के बस में नहीं है इसलिये वे विकास और गवर्नेंस के मुद्दे पर बहस से बचते हैं और भाजपा को इस बात के लिये कोसते हैं कि उसने अनुच्छेद 370 पर अपना रुख नरम कर लिया है। अलगाववादियों से संवाद क्यों कर रही है। आपत्ति यहां तक है कि केन्द्र विकास की योजनाएं सीधे क्यों संचालित कर रहा है, प्रधानमंत्री बार-बार राज्य में आ रहे हैं, केन्द्र से भेजे गये पैसे का हिसाब मांगा जा रहा है आदि।