(हिंदी मिडिया.इन ) जम्मू कश्मीर की स्थिति में बदलाव के लिए आंदोलन कीआवश्‍यकता- राजेन्द्र शुक्ल

जम्मू कश्मीर की वास्तविकता एवं प्रतिमाएँ: मीडिया की भूमिका विषयक राष्ट्रीय संविमर्श में जनसंपर्क मंत्री राजेन्द्र शुक्ल का उद्बोधन

 भोपाल। जम्मू-कश्मीर में शासन व्यवस्था और मानवाधिकार की जो स्थिति है उसमें सुधार एवं बदलाव के लिए बड़े आंदोलन एवं वैचारिक क्रांति की आवश्यकता है। आजादी के बाद जम्मू कश्मीर के लिए अलग विधान बनाए जाने पर पं. श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने मंत्रीमण्डल से इस्तीफा देते हुए आगाह किया था कि एक प्रधान, दो विधान की नीति भारत देश के लिए आने वाले समय में घातक होगी। आज जम्मू कश्मीर की शासन व्यवस्था एवं सुरक्षा पर केन्द्रीय राजकोष की बहुत बड़ी राशि व्यय हो रही है। परंतु उसके बाद भी हालात सुधर नहीं रहे हैं। यह विचार माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय एवं जम्मू कश्मीर अध्ययन केन्द्र, नई दिल्ली द्वारा जम्मू कश्मीर की वास्तविकता एवं प्रतिमाएँ: मीडिया की भूमिका, विषयक राष्ट्रीय संविमर्श में जनसंपर्क मंत्री राजेन्द्र शुक्ल ने व्यक्त किए।

पत्रकारिता विश्वविद्यालय एवं जम्मू कश्मीर अध्ययन केन्द्र, नई दिल्ली तथा इंडियन मीडिया सेंटर, नई दिल्ली के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित तीन दिवसीय राष्ट्रीय संविमर्श का उद्घाटन आज मेपकास्ट सभागार में सम्पन्न हुआ। जम्मू कश्मीर मानवाधिकारी की स्थिति विषयक तकनीकी सत्र में मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित जनसंपर्क मंत्री श्री शुक्ल ने कहा कि धारा 370 लागू करने के संबंध में जो तर्क दिये जाते हैं वह आज गलत साबित हो रहे हैं। देश केबजट का एक बहुत बड़ा हिस्सा जो भारत के विकास में खर्च होना चाहिए वह जम्मू कश्मीर पर खर्च हो रहा है। जम्मू कश्मीर की गलत नीति के कारण जो नुकसान हमने उठाया है उसे अभी भी ठीक किया जा सकता है और इसके लिए बड़ी वैचारिक क्रांति, बड़े आंदोलन की आवश्यकता है।

श्री राजेन्द्र शुक्ल ने इस अवसर पर पत्रकारिता विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित वर्ष 2014 के कैलेण्डर का विमोचन भी किया। यह कैलेण्डर भारतीय संचार परम्पराओं पर आधारित है।

संगोष्ठी के उद्घाटन सत्र में विषय प्रवर्तन करते हुये वरिष्ठ पत्रकार आशुतोष भटनागर ने कहा कि गलत बात बार-बार कही जाए तो वह सही लगने लगती है और यही बात जम्मू कश्मीर के संदर्भ में लागू हो रही है। प्रतिमा यह है कि भारत में पाकिस्तान का विलय अधूरा हुआ था, जबकि वास्तविकता यह है कि वह विलय पूर्ण था। केन्द्रीय सहायता के नाम पर बार-बार वित्तीय पैकेज देकर जम्मू कश्मीर के साथ जो खिलवाड़ हो रहा है उसी का परिणाम है कि वह आज भारत के अन्य राज्यों की तरह विकसित नहीं हो पा रहा है। यदि जम्मू कश्मीर को भारत के अन्य राज्यों के समान दर्जा प्राप्त हो तो वह अपने सांस्कृतिक, भौगोलिक एवं धार्मिक पर्यटन तथा अपनी प्राकृतिक संपदा के बल पर देश का एक विकसित राज्य बन सकता है। 

जम्मू कश्मीर से पधारे वरिष्ठ स्तम्भकार एवं प्राध्यापक काशीनाथ पंडिता ने कश्मीर की ऐतिहासिक एवं भौगोलिक स्थितियों पर विस्तार से प्रकाश डालते हुये बताया कि जम्मू कश्मीर एक ऐसा राज्य है जो पाकिस्तान, चीन, अफगानिस्तान तथा रशिया से सीमांत रूप से जुड़ा हुआ है। आज अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के मंच पर कश्मीर में मानवाधिकार का मुद्दा उठाकर कश्मीर की गलत तस्वीर एक साजिश के तहत पेश की जा रही है। कश्मीर का महत्वपूर्ण हिस्सा लद्दाख मीडिया से कटा हुआ है। इसी कारण हमें वास्तविकता का पता नहीं होता और अलगाववादी ताकतें जो तस्वीर हमारे सामने प्रस्तुत करती हैं, वही प्रतिमा हमारे मस्तिष्क में बनती है।

अध्यक्षीय उद्बोधन में पत्रकारिता विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. कुठियाला ने कहा कि मीडिया ही प्रतिमाएँ गढ़ता है और वास्तविकता को प्रस्तुत करने का काम भी मीडिया का ही होता है। मीडिया की भूमिका अंधेरे कमरे में एक दिया-सलाई के जैसी है। वह सामाजिक विषयों पर प्रकाश डाल सकता है और उसके बाद का काम शेष समाज को करना होता है। पिछले दशक में मीडिया में सकारात्मक परिवर्तन हुआ है। वह जनमानस तक पहुँचा है परंतु जम्मू कश्मीर के विषय में मीडिया वास्तविक चित्र प्रस्तुत नहीं कर रहा है और इस दिशा में बदलाव की आवश्यकता है।

जम्मू कश्मीर की जनसंस्कृति, इतिहास और मीडिया की भूमिका विषय पर प्रकाश डालते हुये प्रो. कुलदीप अग्निहोत्री ने जम्मू कश्मीर, लददाख, गिलगिथ तथा बलूचिस्थान की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, भाषायी एवं सांस्कृतिक विविधता पर प्रकाश डाला। मेजर जनरल आर.एस. सिन्हो ने जम्मू कश्मीर के सामरिक महत्व पर प्रकाश डाला। जम्मू कश्मीर की विधिक एवं संवैधानिक स्थिति पर श्री दयासागर ने प्रकाश डाला। जम्मू कश्मीर में मानवाधिकार की स्थिति विषय पर स्टेट ला कालेज के सहायक प्राध्यापक डा. विश्वास चौहान तथा मानवाधिकार आयोग मध्यप्रदेश के सचिव न्यायमूर्ति कुलदीप जैन ने अपने विचार रखे।

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